1. BPSC की माँग: सही समस्या के लिए सही उपाय पहचानें
सूचना का अधिकार आवेदन किसी लोक प्राधिकारी के पास उपलब्ध या उसके नियंत्रण में रखी सूचना माँगता है; सामान्यतः वह अधिकारी को नया स्पष्टीकरण बनाने के लिए बाध्य नहीं करता। लोकपाल और लोकायुक्त अपने अधिकार-क्षेत्र के भ्रष्टाचार आरोपों की जाँच करते हैं। सामाजिक अंकेक्षण में समुदाय अभिलेखों और धरातल पर हुए काम का मिलान करता है। नागरिक अधिकार-पत्र सेवा-मानक घोषित करता है, किंतु सामान्यतः किसी अलग कानून का आधार मिलने पर ही वह प्रवर्तनीय कानूनी गारंटी बनता है। बिहार का लोक सेवाओं का अधिकार कानून अधिसूचित सेवाओं से संबंधित है, जबकि बिहार का लोक शिकायत कानून सुनवाई और कारणयुक्त निवारण का मार्ग देता है।
हर व्यवस्था में छह बातें पूछें—स्रोत, उपयोगकर्ता, उपाय, समय-सीमा, सक्षम प्राधिकारी और निर्णय का कानूनी प्रभाव। BPSC इनमें से केवल एक बात बदलकर कथन को गलत बना सकता है।
2. शासन की मूल अवधारणाएँ
अवधारणा
अर्थ
प्रमुख साधन
पारदर्शिता
निर्णय, अभिलेख, मानक और व्यय इस प्रकार खुले हों कि उनकी जाँच हो सके।
स्वतः प्रकटीकरण, सूचना का अधिकार, मुक्त आँकड़े
जवाबदेही
प्राधिकारी अपने आचरण का कारण बताए और सुधार, अपील, दंड या संस्थागत जाँच का सामना करे।
विधायिका, अंकेक्षण, न्यायालय, आयोग, लोकपाल
भागीदारी
लोग निष्क्रिय लाभार्थी न रहकर सार्वजनिक निर्णयों को प्रभावित करें या उनकी निगरानी करें।
ग्राम सभा, परामर्श, सामाजिक अंकेक्षण
उत्तरदायित्वपूर्ण प्रतिक्रिया
प्रशासन आवश्यकता और शिकायत का उत्तर उचित या निर्धारित समय में दे।
नागरिक अधिकार-पत्र, शिकायत व्यवस्था, सेवा-गारंटी कानून
विधि का शासन
लोक शक्ति ज्ञात कानून, समानता और समीक्षा के अधीन प्रयुक्त हो।
कारणयुक्त आदेश, अपील, न्यायिक पुनरावलोकन
3. महत्त्वपूर्ण कालक्रम
तिथि
घटना
1975
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण में उच्चतम न्यायालय ने खुले शासन को जनता के जानने के अधिकार से जोड़ा।
1997
प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने संघीय प्रशासन में नागरिक अधिकार-पत्र पहल का समन्वय किया।
12 अक्तूबर 2005
सूचना का अधिकार अधिनियम के अधिकांश कार्यकारी प्रावधान लागू हुए।
15 अगस्त 2011
बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम लागू हुआ।
16 जनवरी 2014
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 लागू हुआ।
5 जून 2016
बिहार की लोक शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की गई।
24 अक्तूबर 2019
सूचना का अधिकार संशोधन अधिनियम लागू हुआ; 2019 के नियम सूचना आयुक्तों के लिए तीन वर्ष का कार्यकाल निर्धारित करते हैं।
13 नवंबर 2025
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम की धारा 44(3) लागू हुई और सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) बदली गई।
1 जुलाई 2026
VB–G RAM G अधिनियम, 2025 पूरे भारत में लागू हुआ और मनरेगा निरस्त हो गया।
4. जानने का अधिकार और सूचना का अधिकार की नींव
प्रावधान
परीक्षोपयोगी अर्थ
अनुच्छेद 19(1)(a)
उच्चतम न्यायालय ने सूचना पाने या जानने के अधिकार को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भाग माना है। यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है।
धारा 3
अधिनियम के अधीन सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार है।
धारा 2(f): सूचना
किसी भी रूप में सामग्री—अभिलेख, दस्तावेज, ई-मेल, मत, सलाह, आदेश, संविदा, प्रतिवेदन, नमूना, मॉडल और इलेक्ट्रॉनिक आँकड़े; साथ ही ऐसी निजी संस्था की सूचना जिसे कोई लोक प्राधिकारी किसी अन्य कानून के अधीन प्राप्त कर सकता है।
धारा 2(h): लोक प्राधिकारी
संविधान, संसद या राज्य के कानून अथवा सरकारी अधिसूचना/आदेश से स्थापित निकाय; सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण या पर्याप्त वित्त-पोषण वाले निकाय और पर्याप्त वित्त-पोषित गैर-सरकारी संगठन भी शामिल।
धारा 2(j): सूचना का अधिकार
कार्य, दस्तावेज और अभिलेख का निरीक्षण; प्रमाणित प्रति या उद्धरण; सामग्री का प्रमाणित नमूना; तथा इलेक्ट्रॉनिक रूप में सूचना।
5. धारा 4: आवेदन से पहले पारदर्शिता
कर्तव्य
विषय
अभिलेख प्रबंधन
अभिलेखों की सूची और अनुक्रमण तैयार करना; संसाधनों के अनुसार उपयुक्त अभिलेखों का संगणकीकरण और नेटवर्क से जुड़ाव।
धारा 4(1)(b)
संगठन/कार्य, शक्तियाँ/कर्तव्य, निर्णय-प्रक्रिया, मानदंड, नियम-पुस्तिकाएँ, दस्तावेज-वर्ग, परामर्श, मंडल/समितियाँ, निर्देशिका, पारिश्रमिक, बजट, अनुदान, रियायतें, इलेक्ट्रॉनिक सूचना और लोक सूचना अधिकारी सहित सत्रह श्रेणियों का प्रकाशन।
अद्यतन
निर्धारित संस्थागत जानकारियों को प्रत्येक वर्ष अद्यतन किया जाना है।
धारा 4(2)
विभिन्न माध्यमों से नियमित रूप से अधिकतम सूचना देना, ताकि व्यक्तिगत आवेदनों की आवश्यकता न्यूनतम हो।
कारण बताना
प्रभावित व्यक्तियों को प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के कारण दिए जाने चाहिए।
7. अपवाद, लोकहित और पृथक्करणीयता
प्रावधान
मुख्य नियम
धारा 8(1)
संप्रभुता/सुरक्षा, न्यायालय द्वारा निषिद्ध सामग्री, विशेषाधिकार, वाणिज्यिक गोपनीयता, वैश्वासिक सामग्री, विदेशी सरकार से गोपनीय सूचना, व्यक्ति/स्रोत की सुरक्षा, अन्वेषण, मंत्रिमंडलीय कागजात और व्यक्तिगत सूचना जैसे निर्दिष्ट हितों की रक्षा।
धारा 8(2)
राजकीय गुप्त बात अधिनियम और धारा 8 के अपवादों के बावजूद, यदि प्रकटीकरण का लोकहित संरक्षित हित को होने वाली हानि से अधिक हो तो सूचना दी जा सकती है।
धारा 10
अपवर्जित अंश को उचित रूप से अलग किया जा सके तो शेष गैर-अपवर्जित भाग पृथक्करण की सूचना के साथ देना होगा।
धारा 24
सूचीबद्ध आसूचना/सुरक्षा संगठन सामान्यतः बाहर हैं, किंतु भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप अपवाद हैं। मानवाधिकार सूचना के लिए आयोग की स्वीकृति और 45 दिन की सीमा है।
9. शिकायत, अपील और दंड
मार्ग
नियम
धारा 18 की शिकायत
लोक सूचना अधिकारी की नियुक्ति न होना, आवेदन लेने से इनकार, सूचना से मना करना, उत्तर न देना, अनुचित शुल्क, अधूरी/भ्रामक सूचना या अन्य बाधा की शिकायत आयोग सुन सकता है।
प्रथम अपील
सामान्यतः 30 दिनों में लोक सूचना अधिकारी से वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष; निस्तारण 30 दिन में, लिखित कारण से अधिकतम 45 दिन।
द्वितीय अपील
सामान्यतः 90 दिनों में केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग के समक्ष; पर्याप्त कारण पर विलंब क्षम्य।
प्रमाण का भार
अपील में अस्वीकृति उचित थी, यह सिद्ध करने का भार लोक सूचना अधिकारी पर है।
धारा 20
आवेदन मिलने या सूचना देने तक ₹250 प्रतिदिन, अधिकतम ₹25,000; पहले सुनवाई का उचित अवसर। निरंतर विफलता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति हो सकती है।
10. केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग
बिंदु
केंद्रीय आयोग
राज्य आयोग
संरचना
मुख्य सूचना आयुक्त + अधिकतम 10 सूचना आयुक्त
राज्य मुख्य सूचना आयुक्त + अधिकतम 10 राज्य सूचना आयुक्त
नियुक्ति
राष्ट्रपति
राज्यपाल
संस्तुति समिति
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल का मंत्री
मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), विधानसभा में विपक्ष के नेता, मुख्यमंत्री द्वारा नामित राज्य मंत्रिमंडल का मंत्री
योग्यता
विधि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार, प्रशासन या शासन में व्यापक ज्ञान/अनुभव वाला प्रतिष्ठित व्यक्ति
प्रतिबंध
सांसद/विधायक, लाभ का पद, राजनीतिक दल से संबंध, व्यापार या पेशा नहीं
कार्यकाल
2019 के नियमों के अनुसार तीन वर्ष; 65 वर्ष की वैधानिक अधिकतम आयु बनी हुई है
11. लोकपाल: संरचना, नियुक्ति और कार्यकाल
बिंदु
2013 के अधिनियम का नियम
प्रकृति
संघ स्तर की वैधानिक भ्रष्टाचार-रोधी संस्था; संवैधानिक निकाय नहीं।
संरचना
अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य।
प्रतिनिधित्व
सदस्यों में 50% न्यायिक सदस्य; कम-से-कम 50% सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं में से।
नियुक्ति
चयन समिति की संस्तुति पर राष्ट्रपति।
चयन समिति
प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, और विधि के अनुसार नामित प्रतिष्ठित विधिवेत्ता।
कार्यकाल
पद ग्रहण से पाँच वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो।
तंत्र
जाँच शाखा और अभियोजन शाखा; व्यय भारत की संचित निधि पर भारित।
12. लोकपाल का अधिकार-क्षेत्र और सुरक्षाएँ
क्षेत्र
नियम
दायरा
अधिनियम की शर्तों के अधीन प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, संघ के समूह A से D तक के लोक सेवक और सार्वजनिक/विदेशी धन पाने वाले निर्दिष्ट व्यक्ति या संस्थाएँ।
प्रधानमंत्री से जुड़े अपवर्जित विषय
अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी/आंतरिक सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा या अंतरिक्ष से संबंधित आरोपों की जाँच नहीं।
प्रधानमंत्री के लिए विशेष प्रक्रिया
अन्य जाँच पर पूर्ण पीठ विचार करेगी और कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य स्वीकृति देंगे; कार्यवाही बंद कक्ष में होगी और खारिज शिकायत के अभिलेख प्रकाशित नहीं होंगे।
सांसद की सुरक्षा
संसद में कही बात या दिए गए मत से जुड़ा विषय अनुच्छेद 105(2) के कारण लोकपाल जाँच से बाहर।
समय-सीमा
कथित अपराध की तिथि से सात वर्ष बाद की गई शिकायत पर जाँच नहीं।
प्रतिवेदन
वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को और फिर संसद के दोनों सदनों के समक्ष; सलाह न मानने पर कारण।
13. लोकपाल, राज्य लोकायुक्त और सूचना आयोग
बिंदु
लोकपाल
लोकायुक्त
केंद्रीय/राज्य सूचना आयोग
मुख्य विषय
संघ स्तर का निर्दिष्ट भ्रष्टाचार
राज्य कानून में निर्धारित भ्रष्टाचार/कुशासन
सूचना तक पहुँच
स्रोत
2013 का अधिनियम
संबंधित राज्य कानून
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005
प्रकृति
वैधानिक
वैधानिक
वैधानिक
एकरूपता
केंद्रीय स्वरूप
राज्य के अनुसार भिन्न
अधिनियम में केंद्रीय/राज्य संरचना
15. सामाजिक अंकेक्षण और वित्तीय अंकेक्षण
सामाजिक अंकेक्षण
वित्तीय/अनुपालन अंकेक्षण
समुदाय और लाभार्थी सरकारी अभिलेख का सेवा तथा धरातलीय स्थिति से मिलान करते हैं।
पेशेवर/वैधानिक अंकेक्षक लेखे, नियमितता, अनुपालन और निष्पादन जाँचते हैं।
हाजिरी-पंजी, बिल, रसीद, माप पुस्तिका, स्थल-जाँच और सार्वजनिक चर्चा का उपयोग।
अंकेक्षण साक्ष्य और मानकों का उपयोग; अंत में संस्थागत प्रतिवेदन।
भागीदारी और स्थानीय जवाबदेही पर बल।
स्वतंत्र तकनीकी जाँच पर बल।
वैधानिक अंकेक्षण, अन्वेषण या मुकदमे का स्थान नहीं लेता।
सामुदायिक सत्यापन का स्थान नहीं लेता।
17. नागरिक अधिकार-पत्र, सेवोत्तम और CPGRAMS
व्यवस्था
परीक्षोपयोगी नियम
नागरिक अधिकार-पत्र
दृष्टि/ध्येय, कार्य, उपयोगकर्ता, सेवाएँ, मानक/समय-सीमा, शिकायत मार्ग और उपयोगकर्ता से अपेक्षाओं की सार्वजनिक प्रतिबद्धता। यह अपने-आप प्रवर्तनीय वैधानिक अधिकार नहीं बनता।
सेवोत्तम
तीन भाग—नागरिक/सेवार्थी अधिकार-पत्र, लोक शिकायत निवारण और सेवा-प्रदान क्षमता।
CPGRAMS
पंजीकरण संख्या, स्थिति-जाँच, प्रतिक्रिया और अपील सुविधा वाला चौबीसों घंटे उपलब्ध केंद्रीय ऑनलाइन शिकायत मंच।
परामर्शी समय-सीमा
2024 के दिशा-निर्देश 21 दिनों में निवारण की सलाह देते हैं; अधिक समय लगे तो कारण और अपेक्षित समय वाला अंतरिम उत्तर। अपील सामान्यतः 30 दिनों में।
बाहर के विषय
सूचना का अधिकार, न्यायालयाधीन/न्यायालय संबंधी, धार्मिक और निर्दिष्ट सरकारी कर्मचारी सेवा-विषय।
19. नागरिक किस द्वार पर जाए?
आवश्यकता
उपयुक्त मार्ग
पहले से उपलब्ध स्वीकृति आदेश की प्रमाणित प्रति
सूचना का अधिकार
बिहार में अधिसूचित प्रमाणपत्र समय पर पाना
बिहार लोक सेवाओं का अधिकार
बिहार की निर्धारित शिकायत की सुनवाई और कारणयुक्त निवारण
बिहार लोक शिकायत कानून
संघ के अधिकार-क्षेत्र वाले पदाधिकारी पर भ्रष्टाचार आरोप