BPSC · Polity

संवैधानिक निकाय II और आयोग

105 min read · Updated 5 Oct 2026

1. BPSC की माँग: पहले वर्गीकरण, फिर विवरण

BPSC किसी परिचित आयोग का कानूनी आधार बदलकर कठिन प्रश्न बना सकता है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग क्रमशः अनुच्छेद 338, 338A और 338B के संवैधानिक निकाय हैं। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग वैधानिक निकाय हैं। अनुच्छेद 344 का राजभाषा आयोग और अनुच्छेद 350B का भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी संवैधानिक व्यवस्थाएँ हैं, जबकि वर्तमान संसदीय राजभाषा समिति राजभाषा अधिनियम, 1963 के अंतर्गत गठित है।

हर संस्था को छह प्रश्नों से पढ़ें: उसे किसने बनाया? नियुक्ति कौन करता है? वह किस वर्ग के हितों की रक्षा करती है? क्या जाँच कर सकती है? प्रतिवेदन कहाँ जाता है? उसका निर्णय बाध्यकारी है या अनुशंसात्मक?

2. वर्गीकरण सारणी

संस्थाकानूनी आधारसही वर्गीकरण
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC)अनुच्छेद 338संवैधानिक
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)अनुच्छेद 338Aसंवैधानिक
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)अनुच्छेद 338Bसंवैधानिक
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM)राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992वैधानिक
राजभाषा आयोगअनुच्छेद 344संवैधानिक
भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारीअनुच्छेद 350Bसंवैधानिक पद
संसदीय राजभाषा समितिराजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4वैधानिक संसदीय समिति
राष्ट्रीय तथा राज्य मानवाधिकार आयोगमानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993वैधानिक

3. महत्वपूर्ण कालक्रम

वर्ष / प्रभावी तिथिघटना
1955अनुच्छेद 344 के अंतर्गत पहला राजभाषा आयोग गठित हुआ, जिसे सामान्यतः बी. जी. खेर आयोग कहा जाता है।
1 नवंबर 1956सातवें संविधान संशोधन से अनुच्छेद 350A और 350B प्रभावी हुए।
12 मार्च 1992पैंसठवें संशोधन के बहुसदस्यीय संयुक्त अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग संबंधी प्रावधान प्रभावी हुए।
17 मई 1993राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 प्रभावी हुआ।
1993–94मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 ने राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोगों तथा मानवाधिकार न्यायालयों की वैधानिक व्यवस्था बनाई।
19 फरवरी 2004उन्यासीवें संशोधन से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग अलग-अलग हुए।
15 अगस्त 2018एक सौ दूसरे संशोधन के अनुच्छेद 338B सहित प्रावधान प्रभावी हुए और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला।
2019मानव अधिकार संरक्षण संशोधन अधिनियम ने राष्ट्रीय और राज्य आयोगों की संरचना तथा कार्यकाल संबंधी नियम बदले।
15 सितंबर 2021एक सौ पाँचवें संशोधन ने राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों की अपने प्रयोजनों के लिए अलग सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची रखने की शक्ति स्पष्ट की।

4. अनुच्छेद 338, 338A और 338B की समान संरचना

बिंदुतीनों आयोगों का नियम
संरचनाअध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य—कुल पाँच व्यक्ति।
नियुक्तिराष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करते हैं।
कार्यकाल और सेवा-शर्तेंसंसद की विधि के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों से निर्धारित।
कार्यविधिप्रत्येक आयोग अपनी कार्यविधि स्वयं विनियमित कर सकता है।
मुख्य कर्तव्यसंरक्षणों की निगरानी, विशिष्ट शिकायतों की जाँच, सामाजिक-आर्थिक विकास में भागीदारी और सलाह, प्रगति का मूल्यांकन, प्रतिवेदन और उपायों की अनुशंसा।
प्रतिवेदनवार्षिक तथा अन्य प्रतिवेदन राष्ट्रपति को; राष्ट्रपति उन्हें कार्रवाई-विवरण और अस्वीकृति के कारणों सहित संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं।
राज्य-संबंधी अंशसंबंधित अंश राज्यपाल को भेजा जाता है; राज्यपाल उसे कार्रवाई-विवरण और अस्वीकृति के कारणों सहित राज्य विधानमंडल के समक्ष रखते हैं।
जाँच की शक्तिसंरक्षणों की जाँच या शिकायत की पड़ताल करते समय निर्दिष्ट विषयों में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ।
नीतिगत परामर्शसंघ और प्रत्येक राज्य सरकार को संबंधित संरक्षित वर्ग पर प्रभाव डालने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों में आयोग से परामर्श करना होता है।

5. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग: अनुच्छेद 338

परीक्षा-बिंदुव्याख्या
संरक्षित वर्गअनुसूचित जातियाँ; अनुच्छेद 366(24) इसकी परिभाषा को अनुच्छेद 341 के अंतर्गत अनुसूचित मानी गई जातियों से जोड़ता है।
सूची की व्यवस्थाअनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति सार्वजनिक अधिसूचना से किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के लिए अनुसूचित जातियाँ निर्दिष्ट करते हैं; राज्य के मामले में राज्यपाल से परामर्श आवश्यक है।
सूची में परिवर्तनसंसद विधि बनाकर किसी जाति, मूलवंश, जनजाति अथवा उसके भाग या समूह को जोड़ अथवा हटा सकती है। बाद की साधारण कार्यपालिका अधिसूचना ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती।
संस्थागत विकासपैंसठवें संशोधन ने पुराने विशेष अधिकारी के स्थान पर अनुसूचित जाति और जनजाति का संयुक्त बहुसदस्यीय आयोग बनाया; उन्यासीवें संशोधन ने बाद में जनजाति आयोग अलग किया।
याद रखने का सूत्र338–अनुसूचित जाति आयोग; 341–अनुसूचित जाति सूची; 366(24)–परिभाषा।

6. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग: अनुच्छेद 338A

परीक्षा-बिंदुव्याख्या
गठनउन्यासीवें संशोधन ने अनुच्छेद 338A जोड़ा; पृथक आयोग 2004 में प्रभावी हुआ।
संरक्षित वर्गअनुसूचित जनजातियाँ; अनुच्छेद 366(25) परिभाषा को अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित मानी गई जनजातियों या जनजातीय समुदायों से जोड़ता है।
सूची की व्यवस्थाराष्ट्रपति राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के लिए सार्वजनिक अधिसूचना से जनजातियाँ निर्दिष्ट करते हैं; राज्य में राज्यपाल से परामर्श होता है। संसद सूची में परिवर्तन विधि से करती है।
अलग आयोग की आवश्यकताजनजातीय विषयों में भूमि, वन, विस्थापन, परंपरागत जीवन और क्षेत्रीय रूप से केंद्रित वंचना जैसे विशिष्ट प्रश्न होते हैं, जिनके लिए केंद्रित निगरानी आवश्यक है।
याद रखने का सूत्र338A–अनुसूचित जनजाति आयोग; 342–अनुसूचित जनजाति सूची; 366(25)–परिभाषा।

7. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग: अनुच्छेद 338B और सूची का प्रश्न

परीक्षा-बिंदुव्याख्या
पहले की स्थितिराष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग मूलतः राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 के अंतर्गत वैधानिक निकाय था।
वर्तमान स्थितिएक सौ दूसरे संशोधन ने 2018 में अनुच्छेद 338B जोड़कर आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया और 1993 का अधिनियम निरसित हुआ।
संरक्षित वर्गसामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग, जिनकी परिभाषा अनुच्छेद 366(26C) में है।
केंद्रीय सूचीअनुच्छेद 342A केंद्र सरकार के प्रयोजनों के लिए राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय सूची में वर्गों को निर्दिष्ट करने और संसद द्वारा विधि से जोड़ने या हटाने की व्यवस्था करता है।
105वें संशोधन के बाद राज्य सूचीप्रत्येक राज्य या संघ राज्य क्षेत्र अपने प्रयोजनों के लिए विधि द्वारा अपनी अलग सूची बना और रख सकता है; वह केंद्रीय सूची से भिन्न हो सकती है।
सामान्य भ्रमअनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच के लिए आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है। यह अनुच्छेद 338B का स्थायी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग नहीं है।

8. अनुच्छेद 341, 342 और 342A की तुलना

प्रश्नअनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिसामाजिक-शैक्षिक पिछड़ा वर्ग
आयोगअनुसूचित जाति आयोग, 338अनुसूचित जनजाति आयोग, 338Aपिछड़ा वर्ग आयोग, 338B
परिभाषा366(24)366(25)366(26C)
सूची का अनुच्छेद341342342A
केंद्रीय संवैधानिक मार्गराष्ट्रपति अधिसूचित करते हैं; संसद विधि से बदलती हैराष्ट्रपति अधिसूचित करते हैं; संसद विधि से बदलती हैराष्ट्रपति केंद्रीय सूची निर्दिष्ट करते हैं; संसद विधि से बदलती है
अलग राज्य पिछड़ा-वर्ग सूचीयह व्यवस्था लागू नहींयह व्यवस्था लागू नहीं105वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 342A(3) में स्पष्ट मान्यता

10. सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ: विस्तार और सीमा

निर्दिष्ट शक्तिअर्थ
समन और उपस्थितिभारत के किसी भी भाग से व्यक्ति को बुलाना, उपस्थिति कराना और शपथ पर परीक्षा करना।
दस्तावेज प्रस्तुत करानाजाँच से संबंधित दस्तावेज की खोज और प्रस्तुति की माँग।
शपथपत्रशपथपत्र के रूप में साक्ष्य ग्रहण करना।
लोक अभिलेखन्यायालय या कार्यालय से लोक अभिलेख अथवा उसकी प्रति मँगाना।
साक्षियों के परीक्षण का आदेशसाक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए आदेशिका जारी करना।
सीमाये जाँच की प्रक्रिया में सहायक शक्तियाँ हैं; आयोग सामान्य सिविल न्यायालय नहीं बनता और आपराधिक, दीवानी या संवैधानिक न्यायालयों का स्थान नहीं लेता।

11. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग: वैधानिक रचना

बिंदुराष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992
प्रकृतिराष्ट्रीय स्तर का वैधानिक आयोग; संवैधानिक आयोग नहीं।
संरचनाअध्यक्ष, उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य—कुल सात व्यक्ति।
नामांकनकेंद्र सरकार प्रतिष्ठा, योग्यता और सत्यनिष्ठा वाले व्यक्तियों को नामित करती है।
प्रतिनिधित्वअध्यक्ष सहित पाँच सदस्य अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों में से होने चाहिए।
कार्यकालतीन वर्ष।
मुख्य कार्यविकास का मूल्यांकन, संरक्षणों की निगरानी, अनुशंसा, अधिकार-वंचना की शिकायतों की पड़ताल, अध्ययन-अनुसंधान और आवधिक या विशेष प्रतिवेदन।
शक्तियाँअधिनियम के अंतर्गत जाँच-संबंधी कार्य करते समय निर्दिष्ट सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ।
प्रतिवेदनवार्षिक प्रतिवेदन केंद्र सरकार को; सरकार कार्रवाई-ज्ञापन और अस्वीकृति के कारणों सहित संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखती है।

12. अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदाय

अधिसूचना चरणसमुदाय
1993 की अधिसूचनामुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी
2014 में जोड़ा गयाजैन
केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत वर्तमान कुलछह अधिसूचित धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय

13. अनुच्छेद 344: राजभाषा आयोग

बिंदुसंवैधानिक नियम
गठनसंविधान के प्रारंभ से पाँच वर्ष पूरे होने पर और फिर दस वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रपति को आयोग गठित करना था।
संरचनाराष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची की विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य।
अनुशंसाएँसंघ के प्रयोजनों के लिए हिंदी का प्रगतिशील प्रयोग; अंग्रेजी के प्रयोग पर प्रतिबंध; अनुच्छेद 348 के प्रयोजन की भाषा; अंकों का रूप; और सौंपे गए भाषायी विषय।
आवश्यक संतुलनभारत की औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति तथा लोक सेवाओं में गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों के न्यायसंगत दावों और हितों का ध्यान।
संबद्ध संवैधानिक समितिअनुच्छेद 344(4) में 30 सांसदों की समिति—लोकसभा से 20 और राज्यसभा से 10—आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत से निर्वाचित।

14. समान नाम वाली दो राजभाषा समितियाँ

बिंदुअनुच्छेद 344(4) की समितिसंसदीय राजभाषा समिति
स्रोतसंविधानराजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4
उद्देश्यअनुच्छेद 344 आयोग की अनुशंसाओं की परीक्षा कर राष्ट्रपति को प्रतिवेदनसंघ के राजकीय प्रयोजनों में हिंदी के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा और राष्ट्रपति को अनुशंसा
सदस्यता30 सांसद: लोकसभा 20 + राज्यसभा 1030 सांसद: लोकसभा 20 + राज्यसभा 10
चयनदोनों सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत सेदोनों सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत से
परीक्षा-भ्रममूल संवैधानिक समय-सारणी का भाग1963 के अधिनियम के अंतर्गत 1976 में गठित सतत वैधानिक समिति

15. भाषायी अल्पसंख्यक संरक्षण: अनुच्छेद 350, 350A और 350B

अनुच्छेदनियम
350कोई व्यक्ति शिकायत-निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी को संघ या राज्य में प्रयुक्त किसी भाषा में अभ्यावेदन दे सकता है।
350Aप्रत्येक राज्य और उसके स्थानीय प्राधिकारी को भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ देने का प्रयास करना चाहिए; राष्ट्रपति राज्य को निर्देश दे सकते हैं।
350Bराष्ट्रपति भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त करते हैं। अधिकारी संवैधानिक संरक्षणों की जाँच कर राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित अंतराल पर प्रतिवेदन देता है।
प्रतिवेदन-मार्गराष्ट्रपति अनुच्छेद 350B के प्रतिवेदन संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते और संबंधित राज्य सरकारों को भेजते हैं।
प्रचलित पदनामभाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त; यह अनुच्छेद 350B का विशेष अधिकारी है, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नहीं।

16. मानवाधिकार व्यवस्था: अर्थ और वर्गीकरण

बिंदुमानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग1993 के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित वैधानिक राष्ट्रीय आयोग।
राज्य मानवाधिकार आयोगउसी अधिनियम के अंतर्गत स्थापित वैधानिक राज्य आयोग।
अधिनियम में मानवाधिकारजीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से संबंधित वे अधिकार जो संविधान द्वारा प्रत्याभूत हैं अथवा अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में निहित हैं और भारत के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।
मूल प्रकृतिजाँच, समीक्षा, अनुशंसा, अनुसंधान, जागरूकता और प्रतिवेदन की संस्था; आपराधिक न्यायालय या संवैधानिक न्यायालयों का विकल्प नहीं।

17. 2019 के संशोधन के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संरचना

पदयोग्यता / स्रोत
अध्यक्षऐसा व्यक्ति जो भारत का मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो।
न्यायिक सदस्य 1उच्चतम न्यायालय का सेवारत या पूर्व न्यायाधीश।
न्यायिक सदस्य 2किसी उच्च न्यायालय का सेवारत या पूर्व मुख्य न्यायाधीश।
विशेषज्ञ सदस्यमानवाधिकार का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले तीन व्यक्ति; उनमें कम-से-कम एक महिला।
निर्दिष्ट कार्यों के लिए पदेन सहभागिताअनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग, महिला और बाल अधिकार संरक्षण आयोगों के अध्यक्ष तथा दिव्यांगजन के मुख्य आयुक्त अधिनियम में निर्दिष्ट कार्यों के लिए भाग लेते हैं।

19. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कार्य और जाँच-शक्तियाँ

कार्यपरीक्षा-योग्य अर्थ
जाँचस्वप्रेरणा से, याचिका पर या न्यायालय के निर्देश पर मानवाधिकार उल्लंघन, उसके दुष्प्रेरण अथवा उल्लंघन रोकने में लोक सेवक की उपेक्षा की जाँच।
न्यायालय में हस्तक्षेपमानवाधिकार उल्लंघन संबंधी लंबित कार्यवाही में न्यायालय की अनुमति से हस्तक्षेप।
संस्थानों का निरीक्षणराज्य के नियंत्रण वाले कारागार या अन्य निरुद्ध/निवास संस्थान का दौरा, जीवन-दशाओं का अध्ययन और सुधार की अनुशंसा।
संरक्षणों की समीक्षासंवैधानिक या कानूनी संरक्षणों की समीक्षा और प्रभावी क्रियान्वयन के उपाय सुझाना।
व्यापक कार्यआतंकवाद सहित मानवाधिकारों में बाधक कारकों की समीक्षा; संधियों का अध्ययन; अनुसंधान, साक्षरता और स्वयंसेवी संगठनों को प्रोत्साहन।
जाँच-शक्तिधारा 13 समन, दस्तावेज, शपथपत्र और लोक अभिलेख जैसी निर्दिष्ट सिविल न्यायालय शक्तियाँ देती है।

20. आयोग क्या सुझा सकता है—और स्वयं क्या नहीं कर सकता

जाँच के बाद आयोग कर सकता हैकानूनी सीमा
प्रतिपूर्ति या हर्जाने की अनुशंसाअनुशंसा अपने-आप प्रवर्तनीय सिविल न्यायालय डिक्री नहीं बनती।
अभियोजन या अन्य उचित कार्रवाई की अनुशंसाआयोग स्वयं अभियुक्त को दोषसिद्ध कर दंड नहीं देता।
उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय जानाउचित निर्देश या आदेश न्यायालय तय करता है।
तत्काल अंतरिम राहत की अनुशंसासंबंधित सरकार या प्राधिकारी अधिनियम की कार्रवाई-प्रक्रिया के अनुसार उत्तर देता है।
जाँच प्रतिवेदन और उत्तर प्रकाशित करनासार्वजनिक जवाबदेही से आयोग आपराधिक विचारण न्यायालय नहीं बन जाता।

21. राज्य मानवाधिकार आयोग और मानवाधिकार न्यायालय

बिंदुराज्य-स्तरीय नियम
राज्य आयोग का स्रोतमानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993; इसलिए यह वैधानिक है।
क्षेत्राधिकारमुख्यतः राज्य सूची और समवर्ती सूची की प्रविष्टियों से संबंधित मानवाधिकार विषय, अधिनियम की सीमाओं और दोहरी जाँच रोकने वाली व्यवस्था के अधीन।
नियुक्तिराज्यपाल, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली वैधानिक समिति की अनुशंसा पर; द्विसदनीय राज्य में अधिनियम के अनुसार विधान परिषद के सभापति और विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं।
मानवाधिकार न्यायालयधारा 30 के अंतर्गत राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, मानवाधिकार उल्लंघन से उत्पन्न अपराधों के शीघ्र विचारण हेतु प्रत्येक जिले के लिए किसी सत्र न्यायालय को विनिर्दिष्ट कर सकती है; यह वैधानिक परंतुक के अधीन है।
बिहार उदाहरणबिहार मानवाधिकार आयोग केंद्रीय 1993 अधिनियम के अंतर्गत राज्य आयोग है; वह संविधान द्वारा सीधे बनाया गया निकाय नहीं है।

22. विकल्प हटाने के लिए त्वरित तुलना

निकायमूल सदस्य-संख्यानियुक्ति / नामांकनप्रतिवेदन का मार्गप्रकृति
अनुसूचित जाति / जनजाति / पिछड़ा वर्ग आयोगप्रत्येक में 5राष्ट्रपति द्वारा अधिपत्रराष्ट्रपति; संसद, तथा राज्य अंश राज्यपाल के माध्यम सेसंवैधानिक
अल्पसंख्यक आयोग7केंद्र सरकार नामित करती हैकेंद्र सरकार और संसदवैधानिक
अनुच्छेद 344 आयोगअनुच्छेद में संख्या निश्चित नहींराष्ट्रपतिसंवैधानिक प्रक्रिया में अनुशंसाओं की परीक्षासंवैधानिक
अनुच्छेद 350B अधिकारीएक विशेष अधिकारीराष्ट्रपतिराष्ट्रपति; संसद और संबंधित राज्यसंवैधानिक पद
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोगअध्यक्ष + 5 पूर्ण सदस्य; इनके अतिरिक्त निर्दिष्ट पदेन सहभागिताचयन समिति की अनुशंसा पर राष्ट्रपतिअधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार और संसदवैधानिक
राज्य मानवाधिकार आयोगवर्तमान विधि के अनुसार अध्यक्ष + 2 सदस्यचयन समिति की अनुशंसा पर राज्यपालराज्य सरकार और राज्य विधानमंडलवैधानिक

23. बिहार के लिए उपयोगिता

शिकायत देखते समय संरक्षित वर्ग और संस्था के स्तर—दोनों को पहचानें। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के राष्ट्रीय आयोग बिहार का विषय सुनते समय भी राष्ट्रीय संवैधानिक आयोग ही रहते हैं। बिहार से संबंधित प्रतिवेदन-अंश राष्ट्रपति से राज्यपाल और फिर बिहार विधानमंडल के समक्ष जाता है। बिहार की राज्य विधि से बने आयोग अलग वैधानिक संस्थाएँ हैं; उन्हें अनुच्छेद 338, 338A या 338B के राष्ट्रीय आयोग का स्थान न दें।

भाषा के विषय में अनुच्छेद 350A का दायित्व और अनुच्छेद 350B की जाँच बिहार सहित सभी राज्यों पर लागू हो सकती है। मानवाधिकार के विषय में बिहार मानवाधिकार आयोग 1993 के अधिनियम के अंतर्गत राज्य आयोग है। राज्य में स्थित होने या अधिकारों की रक्षा करने से वह संवैधानिक निकाय नहीं बनता।

28. BPSC-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न