BPSC · Polity

सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायपालिका

65 min read · Updated 5 Oct 2026

1. BPSC की माँग और पढ़ने की विधि

BPSC प्रायः एक संख्या या संस्था बदल देता है: 65 को 62 वर्ष, उच्च न्यायालय में पाँच वर्ष के न्यायाधीश-कार्य को दस वर्ष, राष्ट्रपति को राज्यपाल, मूल अधिकारिता को सलाहकारी अधिकारिता अथवा अनुच्छेद 226 को अनुच्छेद 32। हर न्यायालय को पाँच खानों में पढ़ें: संरचना, नियुक्ति, योग्यता/कार्यकाल, अधिकारिता और प्रशासनिक नियंत्रण।

यह अध्याय संस्थागत ढाँचा समझाता है। पाँच रिट, जनहित याचिका और अधिकरणों का विस्तृत अध्ययन अगले विषय में होगा; यहाँ उनका उल्लेख केवल सर्वोच्च और उच्च न्यायालय की शक्तियों की तुलना के लिए आवश्यक सीमा तक है।

3. संवैधानिक अनुच्छेद मानचित्र

अनुच्छेदक्षेत्रस्मृति-संकेत
124–128सर्वोच्च न्यायालय की संरचना, न्यायाधीश, कार्यकारी/तदर्थ और सेवानिवृत्त न्यायाधीश।कौन बैठता है
129–130अभिलेख न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का स्थान।स्थिति और स्थान
131–140मूल, अपीलीय, विशेष इजाजत, पुनरावलोकन और अतिरिक्त अधिकारिता।क्या सुनता है
141–144बाध्यकारी विधि, पूर्ण न्याय, राष्ट्रपति का संदर्भ और सहायतार्थ कार्य।निर्णय का प्रभाव
145–147नियम, कर्मचारी/व्यय और निर्वचन।आंतरिक कार्य
214–224Aउच्च न्यायालय, न्यायाधीश, स्थानांतरण, अतिरिक्त/कार्यकारी और सेवानिवृत्त न्यायाधीश।राज्य-स्तरीय वरिष्ठ न्यायालय
225–231उच्च न्यायालय की अधिकारिता, रिट, अधीक्षण, कर्मचारी, संघ राज्यक्षेत्र और साझा उच्च न्यायालय।शक्ति और क्षेत्र
233–237जिला न्यायाधीश, अन्य न्यायिक सेवा, उच्च न्यायालय का नियंत्रण और परिभाषाएँ।अधीनस्थ न्यायपालिका

4. सर्वोच्च न्यायालय: संरचना, स्थान और पीठें

विशेषतानियमप्रारंभिक परीक्षा सावधानी
संरचनाभारत के मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम 33 अन्य न्यायाधीश: न्यायाधीश-संख्या संबंधी विधि में 2019 के संशोधन से स्वीकृत कुल संख्या 34।संविधान में मूलतः मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम सात अन्य थे तथा संसद को संख्या बढ़ाने की शक्ति दी गई थी।
नियुक्तिराष्ट्रपति प्रत्येक न्यायाधीश को अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से, वर्तमान परामर्श/महावृंद व्यवस्था के अंतर्गत नियुक्त करता है।न तो संसद और न ही मुख्य न्यायाधीश अकेले औपचारिक नियुक्ति करते हैं।
स्थानदिल्ली अथवा अनुच्छेद 130 के अंतर्गत राष्ट्रपति की स्वीकृति से मुख्य न्यायाधीश द्वारा निर्धारित अन्य स्थान।स्थान बदलना दूसरा सर्वोच्च न्यायालय बनाना नहीं है।
संविधान पीठसंविधान के निर्वचन से जुड़ा विधि का सारवान प्रश्न या अनुच्छेद 143 का संदर्भ कम-से-कम पाँच न्यायाधीश सुनते हैं।हर संवैधानिक मामले में न्यायालय के सभी न्यायाधीश आवश्यक नहीं।
अभिलेख न्यायालयअनुच्छेद 129; अभिलेख मान्य प्राधिकार रखते हैं और न्यायालय स्वयं की अवमानना के लिए दंड दे सकता है।अनुच्छेद 215 के अंतर्गत उच्च न्यायालय भी अभिलेख न्यायालय हैं।

5. नियुक्ति व्यवस्था: संवैधानिक पाठ और वर्तमान स्थिति

राष्ट्रपति औपचारिक नियुक्ति प्राधिकारी है। न्यायाधीश प्रकरणों से विकसित महावृंद व्यवस्था में वरिष्ठ न्यायाधीश सामूहिक रूप से न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश करते हैं। वर्तमान प्रक्रिया-स्मरणपत्र के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की नियुक्ति का प्रस्ताव आरंभ करने का दायित्व भारत के मुख्य न्यायाधीश का है; उच्च न्यायालय का प्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपने दो वरिष्ठतम सह-न्यायाधीशों के परामर्श से आरंभ होता है।

99वें संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम ने महावृंद का स्थान लेने का प्रयास किया था। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना के उल्लंघन के कारण संशोधन और अधिनियम को अमान्य कर दिया; पूर्व नियुक्ति व्यवस्था फिर लागू हुई। इसलिए वर्तमान प्रश्न में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को कार्यरत नियुक्ति संस्था बताना गलत होगा।

6. सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश: योग्यता और कार्यकाल

बिंदुसंवैधानिक स्थिति
नागरिकताभारत का नागरिक होना चाहिए।
न्यायिक मार्गएक या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम-से-कम पाँच वर्ष न्यायाधीश।
अधिवक्ता मार्गएक या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम-से-कम दस वर्ष अधिवक्ता।
विधिवेत्ता मार्गराष्ट्रपति की राय में विशिष्ट विधिवेत्ता; इस मार्ग के लिए पूर्व न्यायाधीश होना पाठ में आवश्यक नहीं।
सेवानिवृत्ति65 वर्ष।
त्यागपत्रराष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र।
सेवानिवृत्ति के बाद वकालतपूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश भारत के किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष बहस या कार्य नहीं कर सकता।

7. सर्वोच्च या उच्च न्यायालय न्यायाधीश को हटाना

8. सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता

अधिकारिता/शक्तिअनुच्छेददायरा
अनन्य संघीय मूल अधिकारिता131संघ–राज्य या अंतरराज्यीय निर्धारित विवाद, जिसमें किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार शामिल हो; संवैधानिक अपवाद लागू।
मूल अधिकार प्रवर्तन32मूल अधिकार लागू कराने के लिए निर्देश, आदेश और रिट जारी करने की मूल शक्ति।
संवैधानिक अपील132उच्च न्यायालय से अपील, जब संविधान के निर्वचन का विधि-संबंधी सारवान प्रश्न और अपेक्षित प्रमाणपत्र हो।
दीवानी अपील133सामान्य महत्त्व का प्रमाणित सारवान विधिक प्रश्न, जिसका निर्णय सर्वोच्च न्यायालय से आवश्यक हो।
दांडिक अपील134निर्धारित संवैधानिक मार्ग; संसद अनुच्छेद 134(2) से अधिकारिता बढ़ा सकती है।
अपील की विशेष इजाजत136भारत के न्यायालय या अधिकरण के निर्णय/आदेश से व्यापक विवेकाधीन विशेष इजाजत; अनुच्छेद 136(2) सशस्त्र बल संबंधी विधियों के न्यायालय/अधिकरण को बाहर रखता है।
पुनरावलोकन137विधि और न्यायालय-नियमों के अधीन अपने निर्णय या आदेश पर पुनर्विचार।
सलाहकारी143राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्त्व के विधि या तथ्य प्रश्न को भेज सकता है; राय सलाहकारी है, सामान्य पक्षकार-अपील नहीं।

9. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का प्रभाव और विशेष शक्तियाँ

10. न्यायिक पुनरावलोकन: स्रोत और सीमा

न्यायिक पुनरावलोकन में विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों को संविधान पर परखा जाता है तथा संवैधानिक सीमा से बाहर होने पर अमान्य किया जाता है। यह केवल एक अनुच्छेद में नहीं है। अनुच्छेद 13 मूल अधिकार-विरोधी विधि को शून्य करता है; अनुच्छेद 32 और 226 उपचारात्मक अधिकारिता देते हैं; अनुच्छेद 245–246 विधायी क्षमता की सीमा तय करते हैं; अपीलीय उपबंध संवैधानिक प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचाते हैं। केशवानंद भारती (1973) और बाद के निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन तथा न्यायिक स्वतंत्रता को मूल संरचना के तत्त्व मानते हैं।

न्यायिक पुनरावलोकन तथ्यों पर सामान्य अपील जैसा नहीं और न्यायालय को वैकल्पिक विधायिका नहीं बनाता। न्यायालय संविधान-संगतता, वैधता, अधिकारिता और निर्धारित मानकों की जाँच करते हैं। संसद अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधित कर सकती है, किंतु मूल संरचना को क्षति या नष्ट नहीं कर सकती।

11. सर्वोच्च और उच्च न्यायालय की तुलना

विशेषतासर्वोच्च न्यायालयउच्च न्यायालय
संवैधानिक आधारअनुच्छेद 124; पूरे भारत के लिए एक शिखर न्यायालय।अनुच्छेद 214; प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय, जबकि अनुच्छेद 231 साझा उच्च न्यायालय की अनुमति देता है।
सेवानिवृत्ति आयु65।62।
अभिलेख स्थितिअनुच्छेद 129।अनुच्छेद 215।
रिट का दायराअनुच्छेद 32 केवल मूल अधिकार प्रवर्तन के लिए।अनुच्छेद 226 मूल अधिकार और “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए; विषयगत दायरा व्यापक।
संघीय मूल विवादनिर्धारित सरकारी विवादों पर अनुच्छेद 131 की अनन्य अधिकारिता।अनुच्छेद 131 जैसी अधिकारिता नहीं।
सलाहकारी रायअनुच्छेद 143 में राष्ट्रपति का संदर्भ।राष्ट्रपति-संदर्भ की समकक्ष शक्ति नहीं।
बाध्यकारी नजीरअनुच्छेद 141 के अंतर्गत घोषित विधि सभी भारतीय न्यायालयों पर बाध्यकारी।अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों पर बाध्यकारी, पर सर्वोच्च न्यायालय की विधि के अधीन।
अधीक्षणसभी निचले न्यायालयों पर सामान्य अनुच्छेद 227 शक्ति नहीं।सशस्त्र बल अपवाद के अधीन अपने क्षेत्र के न्यायालयों/अधिकरणों पर अनुच्छेद 227 अधीक्षण।

12. उच्च न्यायालय न्यायाधीश: नियुक्ति, योग्यता और कार्यकाल

बिंदुनियम
संरचनामुख्य न्यायाधीश और उतने अन्य न्यायाधीश, जितने राष्ट्रपति आवश्यक समझे।
नियुक्तिराष्ट्रपति नियुक्त करता है। मुख्य न्यायाधीश के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल से परामर्श; अन्य न्यायाधीश के लिए संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श। वर्तमान सिफारिशें महावृंद निर्णयों से चलती हैं।
योग्यताभारतीय नागरिक और भारत में कम-से-कम दस वर्ष न्यायिक पद, अथवा किसी उच्च न्यायालय या लगातार उच्च न्यायालयों में कम-से-कम दस वर्ष अधिवक्ता।
सेवानिवृत्ति62 वर्ष।
त्यागपत्रराष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र।
स्थानांतरणअनुच्छेद 222 के अंतर्गत राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर सकता है।
अतिरिक्त न्यायाधीशकार्यभार की अस्थायी वृद्धि या लंबित मामलों के लिए अधिकतम दो वर्ष; 62 वर्ष के बाद पद पर नहीं रह सकता।
पूर्व स्थायी न्यायाधीश की वकालतसर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर भारत के किसी प्राधिकारी के समक्ष बहस या कार्य नहीं कर सकता।

13. उच्च न्यायालय की अधिकारिता और प्रशासन

अनुच्छेदशक्तिपरीक्षा-बिंदु
215अभिलेख न्यायालय और अवमानना की शक्ति।केवल सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति नहीं।
225संविधान और विधायी परिवर्तन के अधीन विद्यमान अधिकारिता जारी।उच्च न्यायालय की सारी शक्ति केवल अनुच्छेद 226 से नहीं आती।
226मूल अधिकार और किसी अन्य प्रयोजन के लिए निर्देश, आदेश और रिट; क्षेत्रीय/वाद-कारण नियम लागू।विषयगत दायरा अनुच्छेद 32 से व्यापक।
227सशस्त्र बल न्यायालय/अधिकरण को छोड़कर अपने क्षेत्र के न्यायालय और अधिकरण पर अधीक्षण।न्यायिक और प्रशासनिक, दोनों पर्यवेक्षणात्मक पहलू।
228संवैधानिक निर्वचन का सारवान प्रश्न वाला अधीनस्थ न्यायालय का मामला अपने पास लेकर स्वयं तय कर सकता या प्रश्न तय करके लौटा सकता है।निचले न्यायालय को संवैधानिक न्याय-निर्णयन से जोड़ता है।
229निर्धारित नियम/स्वीकृति के अधीन उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त करता है।प्रशासनिक स्वतंत्रता।
230–231संसद संघ राज्यक्षेत्र पर उच्च न्यायालय की अधिकारिता बढ़ा/हटा सकती और साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है।एक उच्च न्यायालय का अर्थ अनिवार्यतः एक राज्य नहीं।

14. जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका

उपबंधनियममहत्त्व
अनुच्छेद 233राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करके जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति करता है। संघ/राज्य सेवा में न रहने वाले सीधे अभ्यर्थी के लिए कम-से-कम सात वर्ष अधिवक्ता/प्लीडर और उच्च न्यायालय की सिफारिश आवश्यक।जिला न्यायाधीश नियुक्ति में उच्च न्यायालय के स्थान पर राज्य लोक सेवा आयोग न रखें।
अनुच्छेद 234जिला न्यायाधीश से भिन्न राज्य न्यायिक सेवा की नियुक्तियाँ राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद बनाए नियमों से होती हैं।दोनों संस्थाओं से संवैधानिक परामर्श।
अनुच्छेद 235जिला और अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रण—जिला न्यायाधीश का पदस्थापन, पदोन्नति और अवकाश सहित—विधिक अपील-अधिकार व सेवा-शर्तों के अधीन उच्च न्यायालय में निहित।प्रशासनिक नियंत्रण अकेले राज्यपाल में नहीं।
अनुच्छेद 236“जिला न्यायाधीश” में कई समकक्ष न्यायिक पद और “न्यायिक सेवा” में जिला तथा निचले दीवानी न्यायिक पद भरने वाली सेवा शामिल।यह केवल एक पदनाम नहीं, संवैधानिक श्रेणी है।
अनुच्छेद 237राज्यपाल सार्वजनिक अधिसूचना से निर्धारित अपवाद/परिवर्तन सहित ये उपबंध मजिस्ट्रेटों के वर्गों पर लागू कर सकता है।मजिस्ट्रेट व्यवस्था के पृथक्करण और न्यायिकीकरण से संबंध।

15. न्यायिक स्वतंत्रता के संरक्षण

संरक्षणकैसे कार्य करता है
पद की सुरक्षावरिष्ठ न्यायालय न्यायाधीश को सामान्य कार्यकारी निर्णय से नहीं हटाया जा सकता; विशेष संसदीय प्रक्रिया आवश्यक है।
सुरक्षित सेवा-शर्तेंनियुक्ति के बाद विशेषाधिकार, भत्ते और पेंशन-अधिकार न्यायाधीश के प्रतिकूल नहीं बदले जा सकते; संविधान का वित्तीय आपात उपबंध अपवाद है।
भारित व्ययसंविधान में निर्दिष्ट न्यायिक वेतन/प्रशासनिक व्यय संबंधित संचित निधि पर भारित हैं और वार्षिक मतदान के लिए नहीं रखे जाते।
आचरण-चर्चा पर रोकअनुच्छेद 121 हटाने के प्रस्ताव के अतिरिक्त संसद में वरिष्ठ न्यायालय न्यायाधीश के आचरण की चर्चा रोकता है; अनुच्छेद 211 राज्य विधानमंडल में समकक्ष नियम देता है।
अपना प्रशासननिर्धारित नियम-व्यवस्था में मुख्य न्यायाधीश/उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश को न्यायालय-कर्मचारियों पर संवैधानिक नियंत्रण।
पुनरावलोकन और अवमाननासंवैधानिक पुनरावलोकन तथा अभिलेख न्यायालय की शक्तियाँ न्यायिक कार्य और आदेश-पालन को सुरक्षित करती हैं।
निचले स्तर पर पृथक्करणअनुच्छेद 50 और 233–235 न्याय-निर्णयन पर कार्यपालिका का नियंत्रण घटाकर अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रण उच्च न्यायालय में रखते हैं।

16. बिहार और पटना उच्च न्यायालय

18. प्रारंभिक परीक्षा के भ्रम-बिंदु

19. आधिकारिक पिछले प्रश्न की स्थिति

इस विषय पर किसी प्रश्न का पूरा पाठ और विकल्प आधिकारिक BPSC प्रश्न-पुस्तिका से सत्यापित नहीं किए गए, इसलिए यहाँ किसी प्रश्न को आधिकारिक पिछले वर्ष का प्रश्न नहीं कहा गया है। नीचे मौलिक BPSC-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।

21. BPSC-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न