पाँच जुड़े भाग तैयार करें: संरचना और अवधि; पीठासीन अधिकारी और सदस्यता; सत्र और मतदान; साधारण तथा धन विधेयक; बजट और कार्यपालिका पर नियंत्रण। प्रश्नों में संसद और राज्य विधानमंडल के नियमों को बदलकर दिया जाता है, राज्य के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक गढ़ी जाती है, विधान परिषद को सरकार हटाने की शक्ति दी जाती है या चौदह दिन और एक महीने की सीमाएँ मिलाई जाती हैं।
हर प्रश्न में पूछें: विषय किस सदन में प्रस्तुत हो सकता है? परिषद उसे रोक सकती है या केवल विलंब कर सकती है? क्या राज्यपाल की सिफारिश चाहिए? कौन-सा बहुमत लागू है? विधान सभा भंग होने पर लंबित विधेयक समाप्त होगा या नहीं?
2. राज्य विधानमंडल में कौन-कौन होते हैं?
अनुच्छेद 168 राज्यपाल को प्रत्येक राज्य विधानमंडल का अंग बनाता है। एकसदनीय राज्य में राज्यपाल और विधान सभा होते हैं। द्विसदनीय राज्य में राज्यपाल, विधान सभा और विधान परिषद होते हैं। बिहार द्विसदनीय है। राज्यपाल किसी सदन का सदस्य नहीं होता, पर सत्र बुलाने, अभिभाषण देने, विधेयक पर कार्रवाई करने और संबंधित अनुच्छेदों के अधीन अध्यादेश जारी करने जैसे संवैधानिक विधायी कार्य करता है।
विधान सभा क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुनी जाती है और जनता के प्रति राजनीतिक उत्तरदायित्व का आधार है। विधान परिषद लगातार रहने वाला, अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित और आंशिक रूप से नामित पुनर्विचार सदन है। वह साधारण विधेयक पर विचार और विलंब कर सकती है, पर विधान सभा को स्थायी रूप से पराजित नहीं कर सकती और न सरकार के बने रहने को नियंत्रित करती है।
3. प्रमुख अनुच्छेद-सारणी
अनुच्छेद
विषय
मुख्य संकेत
168–171
सदन, परिषद का सृजन/उन्मूलन और संरचना।
राज्यपाल अंग है; परिषद हर राज्य में अनिवार्य नहीं।
172–177
अवधि, योग्यता, सत्र, राज्यपाल का अभिभाषण और भागीदारी के अधिकार।
विधान सभा की अवधि है; परिषद लगातार रहने वाला सदन है।
178–187
पीठासीन अधिकारी, वेतन और विधानमंडलीय सचिवालय।
अध्यक्ष/उपाध्यक्ष; सभापति/उपसभापति।
188–193
शपथ, मतदान, रिक्तियाँ, निरर्हता और दंड।
गणपूर्ति: दस या कुल संख्या का दसवाँ भाग—जो अधिक हो।
194–195
शक्तियाँ, विशेषाधिकार, वेतन और भत्ते।
विशेषाधिकार सामान्य आपराधिक विधि तोड़ने की खुली छूट नहीं।
196–201
विधेयक, धन विधेयक और राज्यपाल/राष्ट्रपति चरण।
राज्य स्तर पर संयुक्त बैठक नहीं।
202–207
वार्षिक वित्तीय विवरण, अनुदान, विनियोग और वित्तीय विधेयक।
अनुदान की माँग केवल विधान सभा में।
208–212
नियम, वित्तीय प्रक्रिया, भाषा, न्यायाधीश और प्रक्रियागत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा।
अनुच्छेद 212 प्रक्रियागत अनियमितता से सुरक्षा देता है, मूल असंवैधानिकता से नहीं।
4. विधान परिषद का सृजन या उन्मूलन
चरण
आवश्यकता
परीक्षा भ्रम
विधान सभा संकल्प
विधान सभा की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वालों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत।
केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं।
संसद की विधि
इसके बाद संसद विधि द्वारा परिषद बना या समाप्त कर सकती है।
विधान सभा का संकल्प स्वयं परिषद नहीं बनाता-मिटाता।
संवैधानिक प्रभाव
विधि आवश्यक संवैधानिक और आनुषंगिक प्रावधान कर सकती है।
अनुच्छेद 169(3) इसे अनुच्छेद 368 का संविधान संशोधन नहीं मानता।
परिषद की भूमिका
अनुच्छेद 169 मौजूदा परिषद के उन्मूलन के लिए उसकी सहमति अनिवार्य नहीं करता।
विशेष संकल्प विधान सभा पारित करती है।
5. विधान सभा: संरचना और निर्वाचन
बिंदु
संवैधानिक व्यवस्था
प्रयोग
निर्वाचन विधि
सदस्य क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते हैं।
निर्वाचन विधि के अधीन प्रत्येक क्षेत्र अपना प्रतिनिधि चुनता है।
सामान्य संख्या
अनुच्छेद 333 और संवैधानिक अपवादों के अधीन अधिकतम 500 और न्यूनतम 60।
छोटे राज्यों के अपवादों पर सामान्य सीमा यंत्रवत् लागू न करें।
प्रतिनिधित्व
जहाँ तक संभव हो, हर क्षेत्र की जनसंख्या और आवंटित सीटों का अनुपात पूरे राज्य में समान हो।
परिसीमन के पीछे समानता का सिद्धांत।
आरक्षण
अनुच्छेद 332 विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीट आरक्षण देता है।
यह विधान सभा के लिए है, अनुच्छेद 171 की परिषद श्रेणियों के लिए नहीं।
बिहार
निर्वाचन आयोग के अभिलेख में 243 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं।
मंत्रिपरिषद संख्या-सीमा और बहुमत की गणना विधानसभा संख्या से होती है।
6. विधान परिषद: संख्या और संरचना
श्रेणी
संवैधानिक हिस्सा
निर्वाचक/नियुक्ति मार्ग
स्थानीय प्राधिकारी
यथासंभव एक-तिहाई।
निर्दिष्ट स्थानीय प्राधिकारियों के निर्वाचक मंडल।
स्नातक
यथासंभव एक-बटा-बारह।
कम-से-कम तीन वर्ष से स्नातक या निर्धारित समकक्ष योग्यता वाले व्यक्ति।
शिक्षक
यथासंभव एक-बटा-बारह।
माध्यमिक विद्यालय से कम स्तर न रखने वाली निर्दिष्ट संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष से पढ़ाने वाले व्यक्ति।
विधान सभा सदस्य
यथासंभव एक-तिहाई।
विधायक ऐसे व्यक्तियों को चुनते हैं जो विधान सभा के सदस्य नहीं हैं।
राज्यपाल द्वारा नामित
शेष सदस्य।
साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन या समाज सेवा में विशेष ज्ञान/व्यावहारिक अनुभव वाले व्यक्ति।
7. बिहार विधान परिषद: 75 सीटों की संरचना
मार्ग
बिहार में सीटें
प्रकृति
स्थानीय प्राधिकारी
24
स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्रों से अप्रत्यक्ष चुनाव।
स्नातक
6
स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव।
शिक्षक
6
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव।
विधायकों द्वारा
27
विधान सभा सदस्य परिषद सदस्यों को चुनते हैं।
राज्यपाल द्वारा नामित
12
अनुच्छेद 171(5) के क्षेत्रों से नामांकन।
कुल
75
बिहार की 243 सदस्यीय विधान सभा के सापेक्ष एक-तिहाई सीमा के भीतर।
8. विधान सभा और विधान परिषद की तुलना
बिंदु
विधान सभा
विधान परिषद
निर्वाचन
क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष।
अप्रत्यक्ष और आंशिक रूप से नामित; अनेक प्रकार के निर्वाचन क्षेत्र।
अवधि
सामान्यतः पाँच वर्ष, यदि पहले भंग न हो।
लगातार रहने वाला सदन; भंग नहीं होता।
सेवानिवृत्ति
सामान्य चुनाव में सदस्य एक अवधि के लिए चुने जाते हैं।
यथासंभव एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त।
न्यूनतम आयु
25 वर्ष।
30 वर्ष।
सरकार का विश्वास
मंत्रिपरिषद इसके प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी।
अविश्वास प्रस्ताव से सरकार नहीं हटा सकती।
धन विधेयक
केवल यहाँ प्रस्तुत; अंतिम निर्णय भी इसका।
14 दिन में सिफारिश; संशोधन या निषेध नहीं।
साधारण विधेयक
अनुच्छेद 197 के पुनर्पारण से अंततः प्रभावी।
विलंब और संशोधन-सुझाव, स्थायी निषेध नहीं।
पीठासीन अधिकारी
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
सभापति और उपसभापति।
9. अवधि और आपातकाल में विस्तार
अनुच्छेद 172 के अधीन विधान सभा अपनी पहली बैठक के लिए नियत तिथि से पाँच वर्ष तक रहती है, यदि पहले भंग न कर दी जाए। आपातकाल की उद्घोषणा के दौरान संसद विधि द्वारा एक बार में अधिकतम एक वर्ष का विस्तार कर सकती है, पर उद्घोषणा समाप्त होने के छह महीने बाद तक उससे आगे विस्तार नहीं हो सकता।
विधान परिषद भंग नहीं होती। संसद विधि से ऐसी व्यवस्था करती है कि यथासंभव एक-तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त हों। इससे निरंतरता मिलती है, पर विधान सभा से अधिक लोकतांत्रिक अधिकार नहीं मिलता।
10. सदस्यता-योग्यता, शपथ और रिक्तियाँ
नियम
व्यवस्था
भ्रम
नागरिकता और शपथ
भारत का नागरिक और अधिकृत व्यक्ति के समक्ष निर्धारित शपथ/प्रतिज्ञान।
आसन ग्रहण करने से पहले अनुच्छेद 188 की शपथ आवश्यक।
आयु
विधान सभा के लिए कम-से-कम 25; परिषद के लिए 30 वर्ष।
आयु उलटकर न याद करें।
अतिरिक्त योग्यता
संसद विधि द्वारा निर्धारित कर सकती है।
राज्य विधानमंडल संवैधानिक आयु नहीं बदल सकता।
दोनों राज्य-सदनों की सदस्यता
एक व्यक्ति एक ही राज्य के दोनों सदनों का सदस्य नहीं रह सकता; विधि एक सीट रिक्त होने की व्यवस्था करती है।
द्विसदनीय सदस्यता अनिश्चितकाल साथ नहीं चलती।
अनुपस्थिति
बिना अनुमति साठ दिन अनुपस्थित रहने पर सदन सीट रिक्त घोषित कर सकता है; निर्दिष्ट स्थगन/सत्रावसान अवधि नहीं गिनी जाती।
हर साठ कैलेंडर दिन पर सीट अपने-आप रिक्त नहीं।
अनधिकृत बैठना/मतदान
अनुच्छेद 193 निर्दिष्ट दशाओं में प्रतिदिन ₹500 दंड देता है।
यह संवैधानिक दंड है, सदस्य का वेतन नहीं।
11. निरर्हताएँ और निर्णय करने वाला प्राधिकारी
आधार
अर्थ
लाभ का पद
संघ या राज्य के अधीन लाभ का पद, यदि राज्य विधि ने उसे निरर्हता से मुक्त न किया हो।
मानसिक क्षमता
विक्षिप्त चित्त होना और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित होना।
दिवालियापन
अनुन्मोचित दिवालिया होना।
नागरिकता/निष्ठा
नागरिक न होना, स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता लेना या विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा स्वीकारना।
संसद की विधि
संसद की विधि द्वारा या उसके अधीन निरर्हता।
दल-बदल
दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता, जिसे अनुच्छेद 191(2) मान्यता देता है।
12. सत्र, सत्रावसान, विघटन और गणपूर्ति
शब्द
अर्थ
मुख्य नियम
आह्वान
सदन/सदनों को बैठक के लिए बुलाना।
एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक में छह महीने से अधिक अंतर नहीं।
स्थगन
पीठासीन अधिकारी/सदन द्वारा बैठक कुछ समय के लिए रोकना।
सत्र समाप्त नहीं होता।
सत्रावसान
राज्यपाल की संवैधानिक कार्रवाई से सत्र समाप्त।
विधान सभा भंग नहीं होती।
विघटन
विधान सभा का जीवन समाप्त।
विधान परिषद भंग नहीं हो सकती।
विशेष अभिभाषण
हर सामान्य विधानसभा चुनाव के बाद प्रथम सत्र और हर वर्ष के प्रथम सत्र में राज्यपाल का अभिभाषण।
हर सत्र के आरंभ में आवश्यक नहीं।
गणपूर्ति
दस सदस्य या कुल संख्या का दसवाँ भाग—जो अधिक हो।
जब तक राज्य विधि अन्यथा न करे, सदन में लागू।
13. पीठासीन अधिकारी
सदन
अधिकारी
हटाना और निरंतरता
विधान सभा
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, विधान सभा द्वारा चुने जाते हैं।
विधान सभा के उस समय के समस्त सदस्यों के बहुमत और कम-से-कम चौदह दिन की सूचना से हटाना।
विधान परिषद
सभापति और उपसभापति, परिषद द्वारा चुने जाते हैं।
परिषद के उस समय के समस्त सदस्यों के बहुमत और कम-से-कम चौदह दिन की सूचना से हटाना।
त्यागपत्र
अध्यक्ष उपाध्यक्ष को और उपाध्यक्ष अध्यक्ष को; सभापति उपसभापति को और विपरीत।
त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित नहीं।
विघटन के बाद
अध्यक्ष नई विधान सभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक पद नहीं छोड़ता।
इस निरंतरता से भंग विधान सभा फिर अस्तित्व में नहीं आती।
हटाने का संकल्प
जिस अधिकारी को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो वह पीठासीन नहीं होता।
अध्यक्ष प्रथम मत दे सकता है, पर बराबरी पर निर्णायक मत नहीं।
15. धन विधेयक: विधान सभा की निर्णायक शक्ति
चरण
नियम
प्रस्तुति
धन विधेयक विधान परिषद में प्रस्तुत नहीं हो सकता; केवल विधान सभा में शुरू होता है।
अध्यक्ष का प्रमाण
विधेयक धन विधेयक है या नहीं, प्रश्न उठने पर अनुच्छेद 199 के अधीन विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है।
परिषद की भूमिका
सभा से पारित होने के बाद परिषद चौदह दिन में सिफारिशों सहित लौटा सकती है।
सभा का उत्तर
विधान सभा सभी या कुछ सिफारिशें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
समय पर न लौटाना
चौदह दिन में न लौटाने पर सभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाएगा।
वित्त वर्ष की अनुमानित प्राप्तियाँ और व्यय; भारित व्यय अलग दिखाया जाता है।
सदन/सदनों के समक्ष रखा जाता है।
भारित व्यय
मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं, किंतु चर्चा हो सकती है।
परिषद चर्चा कर सकती है; सभा भी उस पर मत नहीं देती।
अनुदान की माँग
मतदान योग्य विभागीय व्यय की स्वीकृति।
केवल विधान सभा में; स्वीकृत, अस्वीकृत या कम की जा सकती है।
विनियोग विधेयक
मतदान किए अनुदान और भारित व्यय हेतु संचित निधि से निकासी की अनुमति।
वित्तीय पहल और अंतिम नियंत्रण सभा का।
अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान
मूल स्वीकृति से अधिक या नया व्यय पूरा करना।
अनुच्छेद 205 और 203–204 के सिद्धांत लागू।
लेखानुदान
पूरी प्रक्रिया से पहले वित्त वर्ष के एक भाग के लिए अग्रिम अनुदान।
अनुच्छेद 206 के अधीन विधान सभा देती है।
प्रत्ययानुदान
अप्रत्याशित माँग, जिसका विस्तृत विवरण सामान्य रूप से न दिया जा सके।
सामान्य लेखानुदान से अलग।
अपवादानुदान
वित्त वर्ष की वर्तमान सेवा का भाग न बनने वाला अनुदान।
अलग संवैधानिक श्रेणी।
17. विधेयक कब समाप्त होता है?
विधान सभा के विघटन के समय स्थिति
परिणाम
विधान सभा में लंबित विधेयक
समाप्त।
सभा से पारित और परिषद में लंबित विधेयक
समाप्त।
परिषद में लंबित, पर सभा से पारित नहीं
समाप्त नहीं।
सदन/सदनों का सत्रावसान
लंबित विधेयक समाप्त नहीं करता।
18. कार्यपालिका पर विधायी नियंत्रण के साधन
साधन
मुख्य कार्य
विश्वास पर प्रभाव
प्रश्न
सूचना माँगना और प्रशासनिक कार्य की जाँच।
सामान्यतः अपने-आप विश्वास मत नहीं।
ध्यानाकर्षण/चर्चा
तात्कालिक सार्वजनिक विषय सरकार के सामने लाना।
सदन के नियमों के अधीन राजनीतिक जाँच।
समितियाँ
लेखों, आश्वासनों, विधेयकों और प्रशासन की विस्तृत जाँच।
प्रतिवेदन निरीक्षण मजबूत करते हैं; हर प्रतिकूल प्रतिवेदन से सरकार नहीं गिरती।
कटौती प्रस्ताव
विधान सभा में अनुदान माँग का विरोध या कमी।
वित्तीय नियंत्रण और सरकार के बहुमत से जुड़ा।
अविश्वास प्रस्ताव
मंत्रिपरिषद के विधान सभा-विश्वास की परीक्षा।
विधान सभा में चलता है, परिषद में नहीं।
19. विशेषाधिकार, भाषा और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
अनुच्छेद 194 संविधान और सदन के नियमों के अधीन विधानमंडल में वाक्-स्वतंत्रता की रक्षा करता है तथा सदन या उसकी समिति में कही बात या दिए मत के लिए न्यायालयी कार्यवाही से सुरक्षा देता है। यह विधायी काम के लिए कार्यात्मक उन्मुक्ति है, विधायी कार्य से बाहर सामान्य आपराधिक विधि से पूर्ण छूट नहीं।
अनुच्छेद 210 राज्य विधानमंडल की भाषा नियंत्रित करता है। अनुच्छेद 211 उच्चतम या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कर्तव्य-निर्वहन संबंधी आचरण पर चर्चा रोकता है। अनुच्छेद 212 केवल कथित प्रक्रियागत अनियमितता के आधार पर कार्यवाही पर प्रश्न रोकता और प्रक्रियागत/व्यवस्था शक्तियों वाले अधिकारियों की रक्षा करता है; वह मूल रूप से असंवैधानिक विधायी कार्रवाई को न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं करता।
20. बिहार की द्विसदनीय व्यवस्था: संक्षिप्त समयरेखा
23. आधिकारिक पूर्व-प्रश्न स्थिति
किसी प्रश्न को आधिकारिक बीपीएससी पूर्व-प्रश्न नहीं कहा गया है, क्योंकि तैयारी के समय उसके पूरे शब्द और सभी विकल्प आधिकारिक प्रश्न-पुस्तिका से सत्यापित नहीं किए गए। नीचे मौलिक बीपीएससी-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।
25. बीपीएससी-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न