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मुख्यमंत्री, राज्य मंत्रिपरिषद और महाधिवक्ता

65 min read · Updated 5 Oct 2026

1. बीपीएससी की माँग और पढ़ने का तरीका

बीपीएससी में सही प्रावधान के साथ संघ और राज्य से जुड़े भ्रामक विकल्प मिलाए जाते हैं। विशेष रूप से पढ़ें: किसकी नियुक्ति कौन करता है; क्या मुख्यमंत्री का पहले से विधायक होना आवश्यक है; छह महीने का नियम; सामूहिक उत्तरदायित्व; 15 प्रतिशत की अधिकतम सीमा और न्यूनतम बारह मंत्री; दल-बदल संबंधी रोक; अनुच्छेद 167 के कर्तव्य; तथा महाधिवक्ता की योग्यता, पदावधि और विधायी अधिकार।

हर कथन को इस क्रम में जाँचें: संवैधानिक अनुच्छेद → नियुक्ति करने वाला प्राधिकारी → सलाह या बहुमत की शर्त → पदावधि/उत्तरदायित्व → बिहार में प्रयोग। राज्यपाल के नाम से किए गए कार्य को केवल इसी कारण राज्यपाल का व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय न मानें।

2. राज्य स्तर पर संसदीय कार्यपालिका

अनुच्छेद 154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित करता है, जबकि अनुच्छेद 163 मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की व्यवस्था करता है, जो राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है—उन विषयों को छोड़कर जिनमें संविधान विवेक की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 164 मंत्रिपरिषद को विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है। इससे संघ की तरह राज्य में भी संसदीय शासन का मूल ढाँचा बनता है: औपचारिक प्रमुख, वास्तविक राजनीतिक कार्यपालिका और निर्वाचित सदन के प्रति सतत उत्तरदायित्व।

इसलिए मुख्यमंत्री केवल समान स्तर के मंत्रियों में से एक नहीं है। यह पद राज्यपाल, मंत्रिपरिषद, विधानमंडल और प्रशासन को जोड़ता है। फिर भी प्रत्येक शक्ति संविधान, विधि, विधान सभा के विश्वास और जहाँ लागू हो वहाँ न्यायिक समीक्षा के अधीन रहती है।

3. प्रमुख अनुच्छेद-सारणी

अनुच्छेदविषयपरीक्षा संकेत
163राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद।सलाह सामान्य नियम; संविधान द्वारा अपेक्षित विवेक अपवाद।
164नियुक्ति, पदावधि, उत्तरदायित्व, मंत्रियों की संख्या, दल-बदल रोक, शपथ और छह महीने का नियम।सामूहिक उत्तरदायित्व विधान सभा के प्रति।
165राज्य का महाधिवक्ता।राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य हो।
166राज्य सरकार के कार्य का संचालन।कार्यपालिका की कार्रवाई राज्यपाल के नाम से व्यक्त की जाती है।
167राज्यपाल के प्रति मुख्यमंत्री के कर्तव्य।निर्णय, सूचना और मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार का माध्यम।
177राज्य विधानमंडल में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार।दोनों सदनों में बोल और भाग ले सकते हैं; इस अनुच्छेद मात्र से मत नहीं दे सकते।
191 और दसवीं अनुसूचीविधायी निरर्हता और दल-बदल।इसे अनुच्छेद 164(1ख) के साथ पढ़ें।
217(2)उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति की योग्यताएँ।अनुच्छेद 165 महाधिवक्ता के लिए यही योग्यता अपनाता है।

4. मुख्यमंत्री की नियुक्ति और सरकार का गठन

स्थितिसही व्यवस्थापरीक्षा में सावधानी
स्पष्ट बहुमतराज्यपाल विधान सभा में बहुमत रखने वाले नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।संविधान मुख्यमंत्री के प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान नहीं करता।
अस्पष्ट बहुमतराज्यपाल उस व्यक्ति को नियुक्त करता है जिसके सदन का विश्वास प्राप्त करने की सबसे अधिक संभावना हो; विवादित बहुमत का परीक्षण विधान सभा में होना चाहिए।राज्यपाल का व्यक्तिगत आकलन स्थायी रूप से बहुमत-परीक्षण का स्थान नहीं ले सकता।
अन्य मंत्रीमुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल उनकी नियुक्ति करता है।सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिमंडलीय दल का स्वतंत्र चयन नहीं करता।
द्विसदनीय राज्यकानूनी योग्यता और छह महीने के नियम के अधीन मुख्यमंत्री या मंत्री किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व फिर भी विधान सभा के प्रति है, विधान परिषद के प्रति नहीं।
विश्वास खोनाविधान सभा का विश्वास न रखने वाली मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होगा अथवा बहुमत-परीक्षण से उत्पन्न संवैधानिक परिणाम स्वीकार करना होगा।विधान परिषद अविश्वास प्रस्ताव से सरकार नहीं हटा सकती।

5. छह महीने का नियम: अवसर है, बचाव का रास्ता नहीं

अनुच्छेद 164(4) के अनुसार जो मंत्री लगातार छह महीने तक राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहता। यह किसी कानूनी रूप से पात्र गैर-सदस्य को अस्थायी रूप से मंत्रिपरिषद में आने की सुविधा देता है; यह स्वतंत्र छह महीने की पदावधि नहीं बनाता और किसी निरर्हता को समाप्त नहीं करता।

एस. आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उसी विधान सभा के कार्यकाल में एक ही गैर-निर्वाचित व्यक्ति को लगातार छह-छह महीने के लिए बार-बार नियुक्त करना प्रतिनिधिक और उत्तरदायी शासन को विफल करेगा। बी. आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य (2001) में न्यायालय ने कहा कि जो व्यक्ति विधायक बनने से पहले ही निरर्हित है, वह मुख्यमंत्री बनने के लिए अनुच्छेद 164(4) का सहारा नहीं ले सकता। अर्थात् गैर-सदस्यता अस्थायी रूप से सुधारी जा सकती है; कानूनी निरर्हता नहीं।

6. मुख्यमंत्री के प्रमुख कार्य

क्षेत्रभूमिकामहत्त्व
मंत्रिपरिषद का गठनअन्य मंत्रियों की नियुक्ति तथा व्यवहार में उनके विभाग और पदमुक्ति के संबंध में राज्यपाल को सलाह देता है।मंत्रिपरिषद की राजनीतिक संरचना मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द बनती है।
मंत्रिमंडलीय नेतृत्वबैठकों की अध्यक्षता, विभागों का समन्वय और समान नीति सुनिश्चित करता है।सामूहिक उत्तरदायित्व के लिए सार्वजनिक रूप से एक नीति आवश्यक है।
राज्यपाल से संबंधअनुच्छेद 167 के तीन सूचना-संबंधी कर्तव्य पूरे करता है।संवैधानिक संवाद का माध्यम बनाए रखता है।
विधायी नेतृत्वविश्वास, विधेयक, अनुदान और नीतिगत समर्थन प्राप्त करने में सरकार का नेतृत्व करता है।मंत्रिपरिषद तभी रहती है जब उसे विधान सभा का विश्वास प्राप्त हो।
प्रशासनविभागों में समन्वय और सरकारी तंत्र से मंत्रिपरिषद के निर्णय लागू कराता है।कार्यपालिका की कार्रवाई अनुच्छेद 166 की कार्य-संचालन नियमावली से चलती है।
संघ–राज्य और अंतरराज्यीय कार्यसंघीय विचार-विमर्श और अंतर-सरकारी मंचों पर राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करता है।बिहार के वित्त, विकास और अंतरराज्यीय विषयों के लिए महत्त्वपूर्ण।

8. मंत्रिपरिषद: संरचना और संवैधानिक नियम

नियमसंवैधानिक व्यवस्थासामान्य भ्रम
नियुक्तिराज्यपाल मुख्यमंत्री को और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है।अन्य मंत्रियों की नियुक्ति अध्यक्ष की सलाह पर नहीं होती।
पदावधिमंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, पर इसका संचालन संसदीय उत्तरदायित्व के भीतर होता है।मुख्यमंत्री की सलाह और बहुमत रहते हुए यह राज्यपाल की सामान्य व्यक्तिगत पदमुक्ति शक्ति नहीं है।
उत्तरदायित्वमंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।राज्यपाल, विधान परिषद या दोनों सदनों के प्रति संयुक्त रूप से नहीं।
शपथराज्यपाल तीसरी अनुसूची के प्ररूप में पद और गोपनीयता की शपथ दिलाता है।दोनों शपथ संवैधानिक रूप से निर्धारित हैं।
सदस्यतागैर-सदस्य मंत्री लगातार छह महीने बाद पद छोड़ देता है।उसी विधान सभा के कार्यकाल में बार-बार छह महीने की नियुक्ति नहीं।
वेतनवेतन और भत्ते राज्य विधानमंडल विधि द्वारा निर्धारित करता है।राज्यपाल के व्यक्तिगत आदेश से अंतिम निर्धारण नहीं।
जनजातीय कल्याण मंत्रीस्पष्ट संवैधानिक आवश्यकता छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा में लागू है।वर्तमान अनुच्छेद 164 के परंतुक में बिहार नहीं है।

9. मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल समान नहीं हैं

बिंदुमंत्रिपरिषदमंत्रिमंडल
विस्तारसभी संवैधानिक मंत्रियों का व्यापक निकाय।सरकारी व्यवहार में बड़े नीतिगत निर्णय लेने वाला वरिष्ठ और छोटा समूह।
संवैधानिक उल्लेखअनुच्छेद 163 और 164 में स्पष्ट प्रयोग।राज्यों के लिए अनुच्छेद 163–164 में अलग से परिभाषित नहीं।
बैठकहर सामान्य निर्णय के लिए पूरे निकाय का मिलना आवश्यक नहीं।मुख्य समन्वित निर्णयों के लिए अपेक्षाकृत नियमित बैठक।
उत्तरदायित्वसामूहिक संवैधानिक उत्तरदायित्व मंत्रिपरिषद पर है।मंत्रिमंडल व्यावहारिक नीति-एकता देता है, पर मंत्रिपरिषद का स्थान नहीं लेता।

10. सामूहिक उत्तरदायित्व के चार जुड़े अर्थ

सामूहिक उत्तरदायित्व व्यक्तिगत कानूनी दायित्व से अलग है। मंत्री अपने व्यक्तिगत अवैध कार्य के लिए उत्तरदायी रह सकता है, जबकि सरकारी नीति का राजनीतिक उत्तरदायित्व मंत्रिपरिषद वहन करती है। यह “राज्यपाल के प्रसादपर्यंत” से भी अलग है; सामान्य संसदीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री का बहुमत और सलाह मंत्रिपरिषद के राजनीतिक जीवन को नियंत्रित करते हैं।

11. इक्यानबेवाँ संशोधन: संख्या-सीमा और दल-बदल रोक

प्रावधाननियमप्रयोग
164(1क)मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधान सभा के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।आधार विधान सभा की सदस्य संख्या है, विधान सभा और परिषद का योग नहीं।
न्यूनतम संख्यामुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम नहीं होगी।यह स्पष्ट न्यूनतम संख्या छोटे राज्यों में 15 प्रतिशत की गणना से कम संख्या आने से रोकती है।
164(1ख)दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के अधीन निरर्हित सदस्य मंत्री नियुक्त होने के लिए भी निरर्हित होता है।खंड (1ख) में बताई अवधि तक लागू।
रोक की अवधिनिरर्हता से उस विधानमंडल की अवधि समाप्त होने तक या पुनः निर्वाचित होने तक—जो पहले हो।यह आवश्यक रूप से आजीवन रोक नहीं है।

12. अनुच्छेद 166: राज्य का कार्य कैसे चलता है?

राज्य सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की हुई व्यक्त की जाती है। उस नाम से किए गए आदेश और लिखत नियमों के अनुसार अधिप्रमाणित होते हैं; उचित अधिप्रमाणन के बाद उनकी वैधता को केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि उन्हें राज्यपाल ने स्वयं नहीं बनाया या निष्पादित किया। राज्यपाल, संविधान द्वारा विवेक अपेक्षित कार्यों को छोड़कर, सरकारी कार्य के सुविधाजनक संचालन और मंत्रियों में उसके आवंटन के लिए नियम भी बनाता है।

यह औपचारिक ढाँचा प्रशासन की नियमितता और उत्तरदायित्व बनाए रखता है। “राज्यपाल के नाम से” का अर्थ “राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत रूप से तय” नहीं है। विभागीय मंत्री और अधिकारी कार्य-आवंटन तथा कार्य-संचालन नियमों के अधीन कार्य करते हैं और मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति राजनीतिक रूप से उत्तरदायी रहती है।

13. अनुच्छेद 177 के अधीन विधायी भागीदारी

प्रत्येक मंत्री और महाधिवक्ता को विधान सभा तथा जहाँ विधान परिषद है वहाँ दोनों सदनों की कार्यवाही में बोलने और अन्य प्रकार से भाग लेने का अधिकार है। वे विधानमंडल की उस समिति में भी भाग ले सकते हैं जिसके सदस्य के रूप में उनका नाम दिया गया हो। किंतु अनुच्छेद 177 स्वयं मत देने का अधिकार नहीं देता।

जो मंत्री विधायक या विधान पार्षद है, वह अपनी विधायी सदस्यता के कारण और केवल अपने सदन में मत देता है। गैर-सदस्य मंत्री अनुच्छेद 177 के अधीन भाग ले सकता है, किंतु मत नहीं दे सकता। महाधिवक्ता भी केवल अपने संवैधानिक पद के कारण मत नहीं दे सकता।

14. महाधिवक्ता: नियुक्ति, योग्यता और पदावधि

बिंदुनियमभ्रम से बचें
नियुक्तिराज्यपाल राज्य के महाधिवक्ता को नियुक्त करता है।औपचारिक नियुक्ति न राष्ट्रपति करता है, न मुख्य न्यायाधीश।
योग्यताव्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने योग्य होना चाहिए।उसका पहले से न्यायाधीश होना आवश्यक नहीं।
नागरिकताअनुच्छेद 217(2) के अनुसार भारत का नागरिक होना चाहिए।नागरिकता उसी अपनाई गई योग्यता का भाग है।
व्यावसायिक अवधिभारत में कम-से-कम दस वर्ष न्यायिक पद या उच्च न्यायालय/लगातार उच्च न्यायालयों में कम-से-कम दस वर्ष अधिवक्ता।यह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता नहीं है।
पदावधिराज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।पाँच वर्ष की निश्चित संवैधानिक अवधि नहीं।
पारिश्रमिकराज्यपाल द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक मिलता है।अनुच्छेद 165 पूरे देश के लिए समान वेतन तय नहीं करता।

15. महाधिवक्ता के कर्तव्य और स्थिति

क्षेत्रसंवैधानिक व्यवस्था
विधिक सलाहराज्यपाल द्वारा भेजे या सौंपे गए विधिक विषयों पर राज्य सरकार को सलाह देता है।
अन्य विधिक कर्तव्यराज्यपाल द्वारा भेजे या सौंपे गए विधिक प्रकृति के कार्य करता है।
अन्य कार्यसंविधान या उस समय लागू किसी विधि द्वारा दिए गए कार्य करता है।
विधानमंडलअनुच्छेद 177 के अधीन दोनों सदनों और निर्दिष्ट समितियों में बोल और भाग ले सकता है, किंतु इस अनुच्छेद मात्र से मत नहीं दे सकता।
राजनीतिक उत्तरदायित्वमंत्रिपरिषद का सदस्य नहीं है और मंत्री की तरह विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी नहीं है।
अवधिकोई निश्चित संवैधानिक अवधि नहीं; पद राज्यपाल के प्रसादपर्यंत है।

16. संघ और राज्य की तुलना

संघराज्यमुख्य बात
राष्ट्रपतिराज्यपालअपने-अपने कार्यपालिका क्षेत्र के औपचारिक संवैधानिक प्रमुख।
अनुच्छेद 75 के अधीन प्रधानमंत्रीअनुच्छेद 164 के अधीन मुख्यमंत्रीराजनीतिक रूप से उत्तरदायी मंत्रिपरिषद का प्रमुख।
मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति उत्तरदायीमंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति उत्तरदायीलोकप्रिय सदन सरकार के बने रहने को नियंत्रित करता है।
लोक सभा सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत; कोई स्पष्ट न्यूनतम नहींविधान सभा सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत; स्पष्ट न्यूनतम बारहराज्य की न्यूनतम संख्या संघ पर लागू न करें।
महान्यायवादी, अनुच्छेद 76महाधिवक्ता, अनुच्छेद 165राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल; उच्चतम न्यायालय बनाम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता।
महान्यायवादी को अनुच्छेद 76(3) से भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का स्पष्ट अधिकारअनुच्छेद 165 में ऐसा समान राष्ट्रव्यापी अधिकार स्पष्ट रूप से नहीं लिखा हैमहान्यायवादी वाला खंड महाधिवक्ता के लिए न गढ़ें।
अनुच्छेद 88 के अधीन संसद में भागीदारीअनुच्छेद 177 के अधीन राज्य विधानमंडल में भागीदारीकेवल पद के कारण किसी को मताधिकार नहीं मिलता।

17. बिहार के लिए महत्त्व

विशेषताबिहार में प्रयोगप्रारंभिक परीक्षा संकेत
द्विसदनीय विधानमंडलबिहार में विधान सभा और विधान परिषद दोनों हैं।मंत्री किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है, पर मंत्रिपरिषद केवल विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
मंत्रियों की अधिकतम संख्या15 प्रतिशत की गणना विधान सभा की कुल सदस्य संख्या से होगी, दोनों सदनों के योग से नहीं।243 सदस्यीय विधान सभा के आधार पर मुख्यमंत्री सहित अधिकतम पूर्ण संख्या 36 आती है।
महाधिवक्ताबिहार के महाधिवक्ता की नियुक्ति अनुच्छेद 165 के अधीन होती है और वह अनुच्छेद 177 के अधीन दोनों सदनों में भाग ले सकता है।इस कारण उसे मत देने का अधिकार नहीं मिलता।
जनजातीय कल्याण परंतुकवर्तमान अनुच्छेद 164(1) के परंतुक में नामित चार राज्यों में बिहार नहीं है।पुरानी या राज्य-पुनर्गठन से पहले की सूची का प्रयोग न करें।
विश्वाससरकार के बने रहने की परीक्षा बिहार विधान सभा में होती है।बिहार विधान परिषद विश्वास या अविश्वास से सरकार नहीं बनाती-हटाती।

18. संवैधानिक विकास और निर्णय-समयरेखा

21. आधिकारिक पूर्व-प्रश्न स्थिति

यहाँ किसी प्रश्न को आधिकारिक बीपीएससी पूर्व-प्रश्न के रूप में नहीं दिया गया है, क्योंकि तैयारी के समय उसके पूरे शब्द और सभी विकल्प आधिकारिक प्रश्न-पुस्तिका से सत्यापित नहीं किए गए। नीचे दिए गए प्रश्न सत्यापित संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित मौलिक बीपीएससी-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।

23. बीपीएससी-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न