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राज्य न्यायपालिका और राज्य लोक सेवाएँ

70 min read · Updated 5 Oct 2026

1. बीपीएससी की माँग

प्रश्न नियुक्ति और हटाने वाले प्राधिकारी, सेवानिवृत्ति आयु, उच्च न्यायालय की रिट तथा अधीक्षण शक्ति, जिला न्यायाधीश भर्ती, न्यायपालिका के पृथक्करण और राज्य लोक सेवा आयोग की नियुक्ति, अवधि, पदमुक्ति, कार्य तथा प्रतिवेदन पर केंद्रित रहते हैं। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि राज्यपाल किसी पदाधिकारी को नियुक्त करता है तो उसे हटा भी वही सकता है—यह राज्य लोक सेवा आयोग पर गलत है।

2. संवैधानिक मानचित्र

अनुच्छेदविषययाद रखें
214–216उच्च न्यायालय, अभिलेख न्यायालय, संरचना।यह संवैधानिक न्यायालय है और अवमानना-दंड शक्ति रखता है।
217–224कन्यायाधीश: नियुक्ति, अवधि, शपथ, स्थानांतरण, कार्यकारी/अतिरिक्त/सेवानिवृत्त न्यायाधीश।राष्ट्रपति नियुक्त करता है; सेवानिवृत्ति 62 वर्ष।
225–231अधिकारिता, रिट, अधीक्षण, कर्मचारी और साझा उच्च न्यायालय।अनुच्छेद 226 का उद्देश्य अनुच्छेद 32 से व्यापक।
233–237अधीनस्थ न्यायालय।राज्यपाल, उच्च न्यायालय और राज्य लोक सेवा आयोग की अलग भूमिकाएँ।
50कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।न्यायिक स्वतंत्रता का नीति-निदेशक आधार।
315–323संघ और राज्य लोक सेवा आयोग।संवैधानिक निकाय, सुरक्षा, सलाह और वार्षिक प्रतिवेदन।

3. उच्च न्यायालय: स्थिति, संरचना और नियुक्ति

बिंदुनियमसावधानी
अस्तित्वहर राज्य के लिए उच्च न्यायालय; अनुच्छेद 231 से संसद साझा उच्च न्यायालय बना सकती है।एक उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्य/संघ राज्य क्षेत्र को सेवा दे सकता है।
अभिलेख न्यायालयअनुच्छेद 215 अभिलेख स्थिति और अपनी अवमानना के लिए दंड शक्ति देता है।यह राज्य विधानमंडल की दी हुई शक्ति नहीं।
संरचनामुख्य न्यायाधीश और उतने अन्य न्यायाधीश जितने राष्ट्रपति आवश्यक समझे।संविधान समान निश्चित संख्या नहीं देता।
नियुक्तिराष्ट्रपति; भारत के मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल से परामर्श, तथा मुख्य न्यायाधीश से भिन्न न्यायाधीश हेतु संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी।नियुक्ति-पत्र राज्यपाल जारी नहीं करता।
वर्तमान प्रक्रियासंवैधानिक पाठ, न्यायिक रूप से विकसित कॉलेजियम और आधिकारिक प्रक्रिया-ज्ञापन के साथ लागू होता है।इसे कार्यपालिका का एकतरफा चयन न कहें।

4. योग्यता, अवधि और स्वतंत्रता

विशेषतासत्यापित व्यवस्था
योग्यताभारत का नागरिक और भारत में दस वर्ष न्यायिक पद, अथवा उच्च न्यायालय/लगातार उच्च न्यायालयों में दस वर्ष अधिवक्ता।
सेवानिवृत्ति62 वर्ष तक, यदि पहले त्यागपत्र, पदमुक्ति या अन्य संवैधानिक कारण न हो।
त्यागपत्रराष्ट्रपति को संबोधित लेख।
पदमुक्तिराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश वाली संसदीय प्रक्रिया और प्रमाणित दुर्व्यवहार/असमर्थता के आधार पर।
स्थानांतरणभारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद राष्ट्रपति; प्रतिकर भत्ता दिया जा सकता है।
शपथराज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष।
सेवा-शर्तनियुक्ति के बाद भत्ते तथा अवकाश/पेंशन अधिकार अलाभकारी रूप से नहीं बदले जा सकते, वित्तीय आपातकाल के संवैधानिक प्रभाव को छोड़कर।
कर्मचारी/व्ययअनुच्छेद 229 के अधीन मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक नियंत्रण; व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित।

5. उच्च न्यायालय की अधिकारिता

शक्तिक्षेत्रअंतर
रिट, 226मौलिक अधिकार और “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए पाँचों रिट, क्षेत्रीय नियमों के अधीन।उद्देश्य में अनुच्छेद 32 से व्यापक।
अधीक्षण, 227सैन्य विधि के अधीन न्यायालय/अधिकरण छोड़कर क्षेत्र के सभी न्यायालय और अधिकरण।साधारण अपील मात्र नहीं।
संवैधानिक मामला, 228महत्त्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या वाला अधीनस्थ मामला मँगाकर प्रश्न तय करना।प्रामाणिक संवैधानिक निर्णय सुनिश्चित।
मौजूदा अधिकारिता, 225संविधान और सक्षम विधि के अधीन पुरानी तथा वैधानिक दीवानी/फौजदारी अधिकारिता।केवल रिट न्यायालय नहीं।
अवमानना, 215न्याय-प्रशासन और न्यायालय की प्राधिकारिता की रक्षा।अभिलेख न्यायालय स्थिति से जुड़ी।

6. अधीनस्थ न्यायपालिका

नियुक्तिप्राधिकारी/परामर्शनियम
जिला न्यायाधीशउच्च न्यायालय से परामर्श कर राज्यपाल नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति करता है।उच्च न्यायालय की भागीदारी न्यायिक नियंत्रण बचाती है।
सीधी जिला-न्यायाधीश भर्तीसंघ/राज्य सेवा में न हो तो कम-से-कम सात वर्ष अधिवक्ता और उच्च न्यायालय की सिफारिश।सात वर्ष, दस नहीं।
अन्य न्यायिक सेवाराज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद नियमों के अनुसार राज्यपाल।अनुच्छेद 234 में दोनों संस्थाएँ।
नियंत्रणजिला और अधीनस्थ न्यायालय, पदस्थापन, पदोन्नति और अवकाश पर उच्च न्यायालय।अनुच्छेद 235 का नियंत्रण मंत्रिमंडल में नहीं।
मजिस्ट्रेटराज्यपाल सार्वजनिक अधिसूचना से निर्दिष्ट श्रेणियों पर ये प्रावधान लागू कर सकता है।अनुच्छेद 237 सक्षमकारी है।

7. महाधिवक्ता: राज्य वाद का विधिक सेतु

अनुच्छेद 165 में राज्यपाल उच्च न्यायालय न्यायाधीश बनने योग्य व्यक्ति को महाधिवक्ता नियुक्त करता है। वह सरकार को विधिक सलाह देता, सौंपे विधिक कार्य करता, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत रहता और राज्यपाल द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक पाता है। अनुच्छेद 177 से वह दोनों सदनों और नामित समितियों में बोल/भाग ले सकता है, पर केवल पद के कारण मत नहीं देता। वह न उच्च न्यायालय न्यायाधीश है, न मंत्रिपरिषद सदस्य।

8. राज्य लोक सेवा आयोग: संरचना और अवधि

बिंदुनियम
स्थितिअनुच्छेद 315 का संवैधानिक निकाय, केवल कार्यपालिका आदेश का विभाग नहीं।
नियुक्तिअध्यक्ष और सदस्यों को राज्यपाल नियुक्त करता है।
अनुभव सुरक्षायथासंभव आधे सदस्यों ने संघ/राज्य सरकार के अधीन कम-से-कम दस वर्ष पद धारण किया हो।
अवधिपद ग्रहण से छह वर्ष या 62 वर्ष आयु—जो पहले हो।
त्यागपत्रराज्यपाल को संबोधित।
कार्यकारी अध्यक्षरिक्ति/अनुपस्थिति में राज्यपाल किसी सदस्य को कार्य करने हेतु नियुक्त कर सकता है।
उसी पद पर पुनर्नियुक्तिअवधि समाप्ति पर अनुच्छेद 316(3) उसी पद पर पुनर्नियुक्ति रोकता है।

9. पदमुक्ति और स्वतंत्रता

सुरक्षासंवैधानिक नियम
दुर्व्यवहारराष्ट्रपति के निर्देश पर उच्चतम न्यायालय जाँच कर पदमुक्ति योग्य बताए, तब राष्ट्रपति हटा सकता है।
अन्य आधारन्यायनिर्णीत दिवालियापन, कार्यकाल में पद से बाहर सवेतन रोजगार, या राष्ट्रपति की राय में मानसिक/शारीरिक दुर्बलता पर राष्ट्रपति पदमुक्त कर सकता है।
निलंबनउच्चतम न्यायालय को निर्देश भेजे जाने के बाद और राष्ट्रपति के निर्णय तक राज्यपाल राज्य आयोग सदस्य को निलंबित कर सकता है।
माना गया दुर्व्यवहारअनुच्छेद 317(3) में बताए सरकारी संविदा/लाभ में हित को दुर्व्यवहार माना जाता है।
सेवा-शर्तअनुच्छेद 318 के विनियम राज्यपाल बनाता है; नियुक्ति के बाद शर्तें अलाभकारी रूप से नहीं बदलतीं।
व्ययवेतन-पेंशन सहित आयोग व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित।

10. पदोत्तर रोक

पूर्व पदाधिकारीबन सकता हैनहीं बन सकता
राज्य आयोग अध्यक्षसंघ आयोग अध्यक्ष/सदस्य या अन्य राज्य आयोग अध्यक्ष।संघ/राज्य सरकार के अधीन अन्य रोजगार।
राज्य आयोग सदस्यसंघ आयोग अध्यक्ष/सदस्य अथवा उसी/अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष।अन्य सरकारी रोजगार; उसी सामान्य सदस्य पद का दूसरा कार्यकाल नहीं।

11. कार्य, सलाह और उत्तरदायित्व

क्षेत्रभूमिका
परीक्षाराज्य सेवाओं में नियुक्ति हेतु परीक्षाएँ।
भर्ती नियमभर्ती विधि और नियुक्ति, पदोन्नति, सेवा-अंतरण सिद्धांतों पर परामर्श।
उपयुक्ततानियुक्ति, पदोन्नति और अंतरण हेतु अभ्यर्थी की उपयुक्तता पर सलाह।
अनुशासन/दावेअनुशासन तथा निर्दिष्ट विधिक-खर्च और चोट-पेंशन दावे।
अतिरिक्त कार्यअनुच्छेद 321 से राज्य विधानमंडल राज्य/स्थानीय सेवाओं के अतिरिक्त कार्य दे सकता है।
अपवादराज्यपाल परामर्श-अपवाद विनियम बना सकता है; अनुच्छेद 320(4) में 16(4) और 335 हेतु अनिवार्य परामर्श नहीं।
वार्षिक प्रतिवेदनआयोग राज्यपाल को देता है; राज्यपाल विधानमंडल में अस्वीकृत सलाह के कारणों वाले ज्ञापन सहित रखता है।

12. बिहार विशेष

संस्थासत्यापित तथ्यपरीक्षा उपयोग
पटना उच्च न्यायालय9 फरवरी 1916 के अधिकार-पत्र से स्थापित; 1 मार्च 1916 से कार्य आरंभ।1950 के बाद बिहार का संवैधानिक उच्च न्यायालय।
क्षेत्रीय परिवर्तन1948 में उड़ीसा का अलग उच्च न्यायालय; 2000 पुनर्गठन के बाद राँची पीठ झारखंड उच्च न्यायालय बनी।विधिसम्मत राज्य-पुनर्गठन से अधिकारिता बदलती है।
बीपीएससी1 अप्रैल 1949 को अस्तित्व; 26 जनवरी 1950 से अनुच्छेद 315 का संवैधानिक दर्जा।संस्था संविधान से पहले बनी, वर्तमान स्थिति संविधान से।
मुख्यालयआरंभ में राँची; 1 मार्च 1951 को पटना स्थानांतरित।आधिकारिक इतिहास, संवैधानिक खंड नहीं।

15. आधिकारिक पूर्व-प्रश्न स्थिति

पूरे शब्द और विकल्प आधिकारिक पुस्तिका से सत्यापित न होने के कारण कोई प्रश्न आधिकारिक बीपीएससी पूर्व-प्रश्न नहीं कहा गया। ये मौलिक बीपीएससी-शैली प्रश्न हैं।

17. बीपीएससी-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न