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प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और भारत का महान्यायवादी

50 min read · Updated 5 Oct 2026

1. बीपीएससी की माँग और पढ़ने का तरीका

बीपीएससी इस विषय से कथन, सुमेलित युग्म और अनुच्छेद आधारित प्रश्न पूछ सकता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति और संसदीय स्थिति, छह महीने का नियम, सामूहिक उत्तरदायित्व, 15 प्रतिशत की सीमा, मंत्रिपरिषद तथा मंत्रिमंडल का अंतर, राष्ट्रपति की पुनर्विचार शक्ति, अनुच्छेद 78 में प्रधानमंत्री के कर्तव्य और महान्यायवादी की योग्यता, पदावधि व संसदीय अधिकार सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न हल करते समय चार कसौटियाँ रखें: (1) पूरा निकाय मंत्रिपरिषद है या छोटा मंत्रिमंडल, (2) उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति है या पूरी संसद के प्रति, (3) कार्यवाही में भाग लेने के अधिकार के साथ मतदान भी मिलता है या नहीं, और (4) नियम संविधान में लिखा है, कानून से बना है या संसदीय परंपरा है?

2. अनुच्छेद मानचित्र: विषय की पूरी संवैधानिक रीढ़

अनुच्छेदमुख्य नियमस्मरण-संकेत
74प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देती है; एक बार पुनर्विचार संभव; दी गई सलाह की न्यायालय जाँच नहीं कर सकता।सहायता और सलाह
75मंत्रियों की नियुक्ति, संख्या, पदावधि, सामूहिक उत्तरदायित्व, शपथ, छह महीने का सदस्यता नियम और पारिश्रमिक।मंत्री व्यवस्था
76भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति, योग्यता, कर्तव्य, न्यायालय में सुनवाई का अधिकार, पदावधि और पारिश्रमिक।संघ का विधि अधिकारी
77राष्ट्रपति के नाम से संघ की कार्यपालिका कार्रवाई; अधिप्रमाणन तथा कार्य-संचालन और कार्य-वितरण के नियम।सरकारी कार्य
78निर्णयों की सूचना देना, माँगी गई जानकारी देना और कुछ मंत्री-निर्णयों को मंत्रिपरिषद के सामने रखना प्रधानमंत्री का कर्तव्य।राष्ट्रपति–प्रधानमंत्री सेतु
88मंत्री और महान्यायवादी दोनों सदनों, संयुक्त बैठक और निर्धारित समितियों में बोल व भाग ले सकते हैं; केवल इस अनुच्छेद से मतदान का अधिकार नहीं मिलता।भागीदारी, मतदान नहीं
352(3)राष्ट्रीय आपातकाल के लिए “संघ का मंत्रिमंडल” प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल स्तर के मंत्रियों वाली परिषद है।मंत्रिमंडल की संवैधानिक परिभाषा

3. प्रधानमंत्री संसदीय कार्यपालिका का वास्तविक केंद्र क्यों है?

अनुच्छेद 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है, पर अनुच्छेद 74 प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद को राष्ट्रपति की सहायता और सलाह के लिए अनिवार्य बनाता है। 42वें संविधान संशोधन ने सलाह के अनुसार कार्य करना स्पष्ट किया। 44वें संशोधन ने राष्ट्रपति को सलाह पर एक बार पुनर्विचार माँगने का अधिकार दिया, किंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानना अनिवार्य रखा। इस प्रकार औपचारिक प्रधान और राजनीतिक रूप से उत्तरदायी कार्यपालिका साथ-साथ काम करते हैं।

प्रधानमंत्री राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद/मंत्रिमंडल और संसद—इन तीन संस्थाओं की कड़ी है। राजनीतिक अधिकार पद के लिए सीधे देशव्यापी चुनाव से नहीं, बल्कि लोकसभा का विश्वास प्राप्त करने की क्षमता से आता है। संविधान प्रधानमंत्री के लिए पाँच वर्ष की निश्चित अवधि निर्धारित नहीं करता। लोकसभा की सामान्य अवधि पाँच वर्ष हो सकती है, पर सरकार तभी तक रहती है जब तक उसके पास लोकसभा का विश्वास है और प्रधानमंत्री संसदीय व्यवस्था के भीतर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।

4. प्रधानमंत्री की नियुक्ति, सदस्यता और पदावधि

प्रश्नसंवैधानिक उत्तरसामान्य भ्रम
प्रधानमंत्री को कौन नियुक्त करता है?अनुच्छेद 75(1) के अनुसार राष्ट्रपति।लोकसभा औपचारिक नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती।
सामान्यतः किसे नियुक्त किया जाता है?परंपरा से उस नेता को, जो लोकसभा में बहुमत का समर्थन सिद्ध कर सके। स्पष्ट बहुमत न हो तो सदन का प्रमाणित समर्थन निर्णायक है।संविधान यह नहीं कहता कि सबसे बड़े दल के नेता को हर स्थिति में नियुक्त करना ही होगा।
क्या नियुक्त व्यक्ति का पहले से सांसद होना आवश्यक है?नहीं। अनुच्छेद 75(5) किसी मंत्री को लगातार छह महीने तक दोनों सदनों से बाहर रहने की सीमा देता है।छह महीने अस्थायी अवसर है, पाँच वर्ष तक पद पर रहने का अलग मार्ग नहीं।
क्या प्रधानमंत्री का लोकसभा सदस्य होना अनिवार्य है?नहीं। वह किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है; प्रारंभ में गैर-सदस्य हो तो अनुच्छेद 75(5) लागू होगा।लोकसभा के प्रति उत्तरदायित्व का अर्थ हर मंत्री का लोकसभा सदस्य होना नहीं है।
क्या निश्चित पदावधि है?संविधान में निश्चित पदावधि नहीं। बने रहना मुख्यतः लोकसभा के विश्वास पर निर्भर है।स्वतः “पाँच वर्ष” न लिखें।
अन्य मंत्रियों को कौन नियुक्त करता है?राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर।राष्ट्रपति सामान्यतः अपनी इच्छा से अलग मंत्री-दल नहीं चुनता।

5. प्रधानमंत्री के प्रमुख कार्य

“समानों में प्रथम” सामूहिक शासन को समझाता है, पर प्रधानमंत्री की विशेष स्थिति को कम नहीं करता। केवल प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रधान है, उसकी राजनीतिक संरचना नियंत्रित करता है और अनुच्छेद 78 के अंतर्गत राष्ट्रपति तक सूचना पहुँचाने का अनिवार्य माध्यम है।

6. मंत्रिपरिषद: गठन और संवैधानिक शर्तें

उपबंधनियमपरीक्षा में महत्त्व
75(1)राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को और प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है।मंत्रिपरिषद के गठन में प्रधानमंत्री की भूमिका।
75(1A)प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।आधार लोकसभा की कुल सदस्यता है—उपस्थित सदस्य, सत्तापक्ष या दोनों सदन नहीं।
75(1B)दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के अंतर्गत अयोग्य सदस्य निर्दिष्ट अवधि तक मंत्री बनने से भी अयोग्य है।दल-बदल के बाद तत्काल मंत्री-पद के पुरस्कार को रोकता है।
75(2)मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं।सामान्य संसदीय संचालन में यह प्रधानमंत्री की सलाह पर चलता है, राष्ट्रपति की व्यक्तिगत शासन-शक्ति नहीं।
75(3)मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।पूरी सरकार साथ रहती या साथ जाती है।
75(4)राष्ट्रपति तीसरी अनुसूची के अनुसार पद और गोपनीयता की शपथ दिलाता है।दोनों शपथें—केवल पद की नहीं।
75(5)दोनों सदनों से लगातार छह महीने बाहर रहने वाला मंत्री पद छोड़ देता है।किसी भी एक सदन की सदस्यता पर्याप्त है।
75(6)वेतन और भत्ते संसद कानून से निर्धारित करती है।संविधान में सदा के लिए निश्चित नहीं।

7. सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

अनुच्छेद 75(3) का सामूहिक उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति है। इसके तीन व्यावहारिक अर्थ हैं: मंत्रिपरिषद एक राजनीतिक दल की तरह कार्य करती है; मंत्री स्वीकृत सरकारी नीति का सार्वजनिक समर्थन करे या पद छोड़े; और लोकसभा का विश्वास खोने पर पूरी सरकार त्यागपत्र दे अथवा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य राजनीतिक समाधान खोजे। कोई मंत्री राज्यसभा का सदस्य हो सकता है, फिर भी पूरी मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व लोकसभा के प्रति रहेगा।

व्यक्तिगत पदावधि अनुच्छेद 75(2) में राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत कही गई है। संसदीय शासन में प्रधानमंत्री निर्णायक राजनीतिक कड़ी है; राष्ट्रपति सामान्यतः प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी मंत्री को हटाता है। इसलिए सामूहिक उत्तरदायित्व निर्वाचित सदन के प्रति है, जबकि व्यक्तिगत मंत्री का बने रहना राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री पर निर्भर है।

मंत्रिमंडलीय गोपनीयता भीतर खुली चर्चा और बाहर एकमत सरकारी रुख को संभव बनाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारी कार्रवाई संसदीय प्रश्न, संवैधानिक न्यायिक समीक्षा, लेखा-परीक्षा या वैधानिक पारदर्शिता से बाहर हो जाती है।

8. मंत्रिपरिषद, मंत्रिमंडल और मंत्रिमंडलीय समितियाँ

विशेषतामंत्रिपरिषदमंत्रिमंडलमंत्रिमंडलीय समितियाँ
संरचनाप्रधानमंत्री के नेतृत्व में सभी श्रेणियों के केंद्रीय मंत्री।प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल स्तर के मंत्रियों का छोटा आंतरिक समूह।निर्धारित विषयों के लिए चुने गए मंत्रियों के समूह; संरचना बदल सकती है।
संवैधानिक आधारअनुच्छेद 74–75।अनुच्छेद 352(3) के लिए प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल स्तर के मंत्रियों के रूप में स्पष्ट परिभाषा।संवैधानिक निकाय नहीं; कार्यपालिका की कार्य-व्यवस्था के अंतर्गत।
भूमिकासंवैधानिक सलाहकारी और सामूहिक रूप से उत्तरदायी निकाय।मुख्य उच्चस्तरीय राजनीतिक निर्णय समूह।दिए गए क्षेत्र में विस्तृत जाँच, समन्वय या निर्णय।
आकारबड़ा; अनुच्छेद 75(1A) की सीमा लागू।मंत्रिपरिषद का छोटा भाग।और छोटे, कार्य-आधारित समूह।

9. मंत्री-सलाह और संख्या का संवैधानिक विकास

10. अनुच्छेद 77 और 78: मंत्रिमंडलीय निर्णय से संवैधानिक कार्रवाई तक

चरणनियमअनुच्छेद
औपचारिक अभिव्यक्तिभारत सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की हुई कही जाती है।77(1)
अधिप्रमाणनआदेश/लिखत नियमों के अनुसार अधिप्रमाणित होते हैं; ठीक से अधिप्रमाणित होने पर केवल इस आधार पर उनकी वैधता पर प्रश्न नहीं उठता कि राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें नहीं बनाया।77(2)
कार्य-नियमराष्ट्रपति सरकारी कार्य के सुविधाजनक संचालन और मंत्रियों में उसके वितरण के नियम बनाता है।77(3)
निर्णयों की सूचनाप्रधानमंत्री संघ के प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के निर्णय राष्ट्रपति को बताता है।78(क)
जानकारीराष्ट्रपति माँगे तो प्रधानमंत्री प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित जानकारी देता है।78(ख)
परिषद द्वारा विचारराष्ट्रपति कहे तो प्रधानमंत्री किसी मंत्री द्वारा निर्णयित, पर मंत्रिपरिषद द्वारा अविचारित विषय को परिषद के सामने रखता है।78(ग)

11. भारत का महान्यायवादी: अनुच्छेद 76

भारत का महान्यायवादी संघ का संवैधानिक विधि अधिकारी है। राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने योग्य हो। अनुच्छेद 124(3) इस योग्यता को भारतीय नागरिकता तथा निर्धारित व्यावसायिक मार्गों से जोड़ता है—कम से कम पाँच वर्ष उच्च न्यायालय का न्यायाधीश, कम से कम दस वर्ष उच्च न्यायालय का अधिवक्ता, अथवा राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता।

महान्यायवादी राष्ट्रपति द्वारा भेजे या सौंपे गए विधिक विषयों पर भारत सरकार को सलाह देता है, राष्ट्रपति द्वारा दिए अन्य विधिक कर्तव्य निभाता है और संविधान अथवा कानून से मिले कार्य करता है। उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है। संविधान कोई निश्चित पदावधि नहीं देता; वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक पाता है।

12. महान्यायवादी: संसदीय स्थिति और महत्त्वपूर्ण अंतर

विषयसही स्थिति
संसदीय भागीदारीअनुच्छेद 88 महान्यायवादी को किसी भी सदन, संयुक्त बैठक और उस संसदीय समिति में बोलने तथा भाग लेने देता है जिसका उसे सदस्य नामित किया गया हो।
मतदानकेवल अनुच्छेद 88 के आधार पर मतदान का अधिकार नहीं मिलता।
सदस्यताअनुच्छेद 88 महान्यायवादी को किसी सदन का सदस्य नहीं बनाता और पद धारण करने मात्र से वह मंत्रिपरिषद का सदस्य भी नहीं होता।
न्यायालय में प्रवेशअनुच्छेद 76(3) के अंतर्गत पूरे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार।
पदावधिराष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत; संविधान में निश्चित अवधि या महाभियोग प्रक्रिया नहीं।
संघ के अन्य विधि अधिकारीसॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संघ की सहायता करते हैं, पर उनके पद अनुच्छेद 76 से निर्मित संवैधानिक पद नहीं हैं।

13. भारत का महान्यायवादी और बिहार का महाधिवक्ता

बिंदुभारत का महान्यायवादीबिहार का महाधिवक्ता
संवैधानिक अनुच्छेद76165
नियुक्ति प्राधिकारीराष्ट्रपतिराज्यपाल
योग्यताउच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य।उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य।
किस सरकार को सलाह?भारत सरकारबिहार सरकार
विधायिका में भागीदारीअनुच्छेद 88 के अधीन संसद में; केवल इस अधिकार से मतदान नहीं।अनुच्छेद 177 के अधीन राज्य विधानमंडल में; केवल इस अधिकार से मतदान नहीं।
पदावधिराष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत।राज्यपाल के प्रसादपर्यंत।

14. बिहार के संदर्भ में

16. प्रारंभिक परीक्षा के भ्रम-जाल

17. आधिकारिक पूर्व प्रश्न संबंधी टिप्पणी

तैयारी के समय किसी आधिकारिक बीपीएससी प्रश्न-पुस्तिका से प्रश्न की पूरी भाषा और विकल्प सत्यापित नहीं हुए, इसलिए यहाँ कोई प्रश्न आधिकारिक पूर्व प्रश्न के रूप में नहीं दिया गया है। नीचे के सभी प्रश्न मौलिक बीपीएससी-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।

19. अभ्यास: ठीक 20 बीपीएससी प्रारंभिक परीक्षा-शैली बहुविकल्पीय प्रश्न