सीधे अनुच्छेद मिलान के साथ ऐसे कथन भी आते हैं जिनमें लोकसभा और राज्यसभा के नियम आपस में बदल दिए जाते हैं। सबसे उपयोगी जोड़ियाँ हैं—प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष चुनाव, 25 बनाम 30 वर्ष, विघटन बनाम स्थायी सदन, अध्यक्ष बनाम सभापति, प्रथम मत बनाम निर्णायक मत, संवैधानिक अधिकतम बनाम वर्तमान संख्या, और सामान्य अयोग्यता बनाम दसवीं अनुसूची की अयोग्यता।
हर कथन पर तीन प्रश्न लगाएँ: व्यक्ति को कौन चुनता है? कौन-सा बहुमत या संख्या-नियम लागू है? यह सदन का नियम, संविधान का पाठ या वर्तमान सीट-संख्या है? इससे स्थायी उपबंधों को परिसीमन अथवा रिक्ति से बदल सकने वाली संख्याओं के साथ मिलाने की भूल नहीं होगी।
2. अनुच्छेद मानचित्र
अनुच्छेद
विषय
स्मरण-संकेत
79–82
संसद, दोनों सदनों की संरचना और जनगणना के बाद पुनःसमायोजन।
कौन बैठता है, कितने सदस्य
83–88
अवधि, योग्यता, सत्र, राष्ट्रपति के अभिभाषण/संदेश, मंत्री व महान्यायवादी के अधिकार।
जीवन और बैठक
89–98
सभापति/उपसभापति, अध्यक्ष/उपाध्यक्ष, स्थानापन्न व्यवस्था, वेतन और अलग सचिवालय।
पीठासीन पदाधिकारी
99–100
सदस्य की शपथ, मतदान, रिक्तियाँ और गणपूर्ति।
बैठक कैसे चलती है
101–104
स्थान रिक्त होना, अयोग्यता, निर्णय प्राधिकारी और अनधिकृत बैठने/मत देने पर दंड।
सदस्यता कैसे जाती है
105
सदनों, सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ।
कार्य हेतु संरक्षण
3. संसद की संरचना: अनुच्छेद 79
संघ की संसद में राष्ट्रपति और दो सदन—राज्यों की परिषद (राज्यसभा) तथा जनता का सदन (लोकसभा)—शामिल हैं। राष्ट्रपति किसी सदन में सदस्य की तरह बैठकर मतदान नहीं करता, पर संसद बुलाने, सत्रावसान, लोकसभा विघटन, अभिभाषण, विधेयक पर अनुमति और अध्यादेश जैसे आवश्यक विधायी कार्य करता है। इसलिए “राष्ट्रपति संसद का अंग है” सही, पर “राष्ट्रपति संसद का सदस्य है” गलत है।
द्विसदनीयता प्रतिनिधित्व के दो मार्ग देती है। लोकसभा प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों और वयस्क मताधिकार से जनता का प्रतिनिधित्व करती है। राज्यसभा राज्यों तथा पात्र संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है और नामनिर्दिष्ट सदस्य विशिष्ट ज्ञान जोड़ते हैं। दोनों सदन हर विषय में समान नहीं—मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है और वित्तीय प्रक्रिया में लोकसभा विशेष है; अनुच्छेद 249 व 312 राज्यसभा को विशेष संघीय शक्तियाँ देते हैं।
4. राज्यसभा: संरचना और निर्वाचन
विशेषता
नियम
परीक्षा-सावधानी
संवैधानिक अधिकतम
250: राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के अधिकतम 238 प्रतिनिधि और राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट 12 सदस्य।
245 को संवैधानिक अधिकतम न लिखें।
वर्तमान स्वीकृत संख्या
245: 233 निर्वाचित और 12 नामनिर्दिष्ट; सितंबर 2026 में जाँची गई आधिकारिक राज्यसभा/निर्वाचन आयोग सामग्री के अनुसार।
रिक्तियों से वास्तविक कार्यरत संख्या कुछ समय कम हो सकती है।
राज्य प्रतिनिधि
राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से चुनते हैं।
नागरिक सीधे नहीं चुनते; विधान परिषद सदस्य मत नहीं देते।
संघ राज्य क्षेत्र
संसद द्वारा कानून में निर्धारित रीति से चुने जाते हैं।
प्रत्येक संघ राज्य क्षेत्र को सीट मिलना आवश्यक नहीं।
नामनिर्देशन के क्षेत्र
साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष ज्ञान अथवा व्यावहारिक अनुभव।
“सहकारिता आंदोलन” राज्य विधान परिषद की नामांकन सूची में है, अनुच्छेद 80(3) में नहीं।
सीट-वितरण
चौथी अनुसूची; सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व समान नहीं।
राज्यसभा संघीय है, पर समान राज्य-मत वाली व्यवस्था नहीं।
5. लोकसभा: संरचना और प्रतिनिधित्व
बिंदु
स्थिति
प्रत्यक्ष सीटों की सीमा
राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से अधिकतम 530 तथा संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व हेतु अधिकतम 20—अनुच्छेद 81 के अंतर्गत कुल 550 प्रत्यक्ष सीटें।
वर्तमान निर्वाचन क्षेत्र
डिजिटल संसद और निर्वाचन आयोग सामग्री के अनुसार देश अभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित है।
निर्वाचन
वयस्क मताधिकार पर प्रत्यक्ष चुनाव; वर्तमान व्यवस्था में प्रत्येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य।
जनसंख्या सिद्धांत
जहाँ तक संभव हो, राज्यों के बीच सीट/जनसंख्या अनुपात तथा राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्र/जनसंख्या अनुपात समान; संवैधानिक अपवाद और पुनःसमायोजन रोक के अधीन।
आंग्ल-भारतीय नामनिर्देशन
104वें संशोधन से बदले अनुच्छेद 334(ख) के अनुसार विशेष नामनिर्दिष्ट प्रतिनिधित्व संविधान लागू होने के 70 वर्ष बाद समाप्त हो गया। वर्तमान लोकसभा में इससे नामनिर्दिष्ट सीट नहीं जुड़ती।
6. परिसीमन और प्रतिनिधित्व: अनुच्छेद 81–82
हर जनगणना के बाद संसद द्वारा निर्धारित प्राधिकारी और रीति से सीट-वितरण तथा प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों का पुनःसमायोजन होता है। संविधान संशोधनों ने 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित होने तक राज्यों के बीच सीट-वितरण को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखा, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनःसमायोजन 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ। अतः किस राज्य की लोकसभा सीटें कितनी हैं और राज्य के भीतर सीमाएँ कैसे खींची गईं अलग प्रश्न हैं।
106वें संशोधन ने महिला आरक्षण के उपबंध जोड़े, किंतु अनुच्छेद 334A के अनुसार लोकसभा में आरक्षण तभी प्रभावी होगा जब संशोधन लागू होने के बाद पहली जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित हों और उनके आधार पर इस प्रयोजन से परिसीमन हो। उस संवैधानिक शर्त के बिना इसे वर्तमान लोकसभा की संरचना बदल चुका नहीं कहना चाहिए।
7. लोकसभा और राज्यसभा की तुलना
विशेषता
लोकसभा
राज्यसभा
प्रतिनिधित्व
प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों की जनता।
राज्य/पात्र संघ राज्य क्षेत्र तथा 12 नामनिर्दिष्ट विशेषज्ञ।
चुनाव
प्रत्यक्ष।
राज्य प्रतिनिधि: निर्वाचित विधायक, आनुपातिक प्रतिनिधित्व–एकल संक्रमणीय मत।
न्यूनतम आयु
25 वर्ष।
30 वर्ष।
अवधि
पूर्व विघटन न हो तो पाँच वर्ष; आपातकालीन विस्तार सीमित।
स्थायी सदन; लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त।
पीठासीन अधिकारी
सदस्य अपने बीच से अध्यक्ष चुनते हैं।
उपराष्ट्रपति पदेन सभापति; सदस्य अपने बीच से उपसभापति चुनते हैं।
सरकार का उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसी सदन के प्रति उत्तरदायी।
सरकार से प्रश्न/बहस कर सकती है, पर लोकसभा वाली विश्वास-प्रक्रिया से सरकार नहीं हटाती।
धन विधेयक
केवल यहीं प्रस्तुत; अध्यक्ष प्रमाणित करता है।
14 दिन में सिफारिश; अंतिम रूप से संशोधन या अस्वीकृति नहीं।
विघटन
विघटित हो सकती है; लागू नियमों के अनुसार लंबित कार्य समाप्त हो सकते हैं।
कभी विघटित नहीं।
8. अवधि, सत्र, स्थगन, सत्रावसान और विघटन
9. राष्ट्रपति का अभिभाषण और भागीदारी अधिकार
अनुच्छेद 86 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी एक सदन या दोनों संयुक्त सदनों को संबोधित और संदेश भेज सकता है। अनुच्छेद 87 आम चुनाव के बाद लोकसभा के प्रथम सत्र के आरंभ और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में विशेष अभिभाषण अनिवार्य करता है। प्रत्येक सत्र के आरंभ में अभिभाषण संवैधानिक रूप से आवश्यक नहीं।
अनुच्छेद 88 हर मंत्री और महान्यायवादी को किसी भी सदन, संयुक्त बैठक तथा उस समिति में बोलने और भाग लेने देता है जिसका उसे सदस्य नामित किया गया हो, पर केवल इसी अनुच्छेद से मतदान नहीं मिलता। एक सदन का सदस्य मंत्री दूसरे सदन में बोल सकता है, किंतु केवल मंत्री होने के कारण वहाँ मत नहीं दे सकता।
10. पीठासीन पदाधिकारी और उनका हटाया जाना
पद
चयन/स्थिति
त्यागपत्र और हटाना
निरंतरता
राज्यसभा सभापति
उपराष्ट्रपति पदेन सभापति; राज्यसभा सदस्यों में से नहीं चुना जाता।
अनुच्छेद 67 की उपराष्ट्रपति हटाने की प्रक्रिया: राज्यसभा आरंभ, लोकसभा सहमति, 14 दिन की सूचना।
पद रिक्त हो या उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का कार्य करे तो उपसभापति कार्य करता है।
राज्यसभा उपसभापति
राज्यसभा अपने सदस्यों में से चुनती है।
सभापति को त्यागपत्र; कम से कम 14 दिन की सूचना के बाद राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से हटाना।
राज्यसभा सदस्य न रहने पर पद रिक्त।
लोकसभा अध्यक्ष
लोकसभा अपने सदस्यों में से चुनती है।
उपाध्यक्ष को त्यागपत्र; कम से कम 14 दिन की सूचना के बाद लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से हटाना।
विघटन के बाद नई लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक पद पर रहता है।
लोकसभा उपाध्यक्ष
लोकसभा अपने सदस्यों में से चुनती है।
अध्यक्ष को त्यागपत्र; वही बहुमत और सूचना।
अध्यक्ष जैसी विघटन-पश्चात विशेष निरंतरता नहीं।
11. स्थानापन्न व्यवस्था और हटाने के प्रस्ताव में मतदान का भ्रम
स्थिति
नियम
अध्यक्ष बैठक से अनुपस्थित
उपाध्यक्ष; फिर सदन के नियम से निर्धारित व्यक्ति; कोई न हो तो सदन द्वारा निर्धारित व्यक्ति।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद रिक्त
राष्ट्रपति द्वारा इस प्रयोजन से नियुक्त लोकसभा सदस्य अध्यक्ष के कर्तव्य करता है; इसे प्रचलित रूप से सामयिक अध्यक्ष कहते हैं।
अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन
अध्यक्ष पीठासीन नहीं होगा, बोल/भाग ले सकता है और प्रथम अवसर पर मत दे सकता है, पर मत बराबर होने पर निर्णायक मत नहीं।
राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हटाने का प्रस्ताव
सभापति पीठासीन नहीं होगा और बोल/भाग ले सकता है, किंतु उस कार्यवाही में बिल्कुल मतदान नहीं कर सकता।
सामान्य बैठक
पीठासीन अधिकारी प्रथम अवसर पर मत नहीं देता, पर मत बराबर हों तो निर्णायक मत देता है।
12. सदस्यता: योग्यता, शपथ, मतदान और गणपूर्ति
बिंदु
नियम
उम्मीदवारी की नागरिकता/शपथ
भारतीय नागरिक; निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकृत व्यक्ति के समक्ष निर्धारित शपथ/प्रतिज्ञान; साथ में कानून की अन्य योग्यताएँ।
न्यूनतम आयु
लोकसभा 25; राज्यसभा 30 वर्ष।
स्थान ग्रहण से पहले शपथ
राष्ट्रपति या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची के प्रारूप में।
सामान्य मतदान
जब तक संविधान अन्यथा न कहे, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत।
गणपूर्ति
जब तक संसद अन्यथा कानून न बनाए, सदन की कुल सदस्यता का एक-दशमांश।
गणपूर्ति न हो
पीठासीन अधिकारी सदन स्थगित करेगा या गणपूर्ति होने तक बैठक निलंबित करेगा।
सदन में रिक्ति
रिक्तियों के बावजूद सदन कार्य कर सकता है; केवल रिक्ति से कार्यवाही अमान्य नहीं।
13. स्थान रिक्त होना और अयोग्यता
आधार/प्रक्रिया
संवैधानिक नियम
संसद के दोनों सदन
एक व्यक्ति दोनों का सदस्य नहीं रह सकता; संसद कानून से एक स्थान खाली होने की व्यवस्था करती है।
संसद और राज्य विधानमंडल
दोनों में सदस्य नहीं रह सकता; निर्धारित अवधि में राज्य का स्थान न छोड़े तो संसद का स्थान रिक्त।
त्यागपत्र
सभापति या अध्यक्ष को लिखित; जाँच के बाद स्वैच्छिक या वास्तविक न लगे तो स्वीकार नहीं होगा।
बिना अनुमति अनुपस्थिति
सभी बैठकों से 60 दिन बिना सदन की अनुमति अनुपस्थित रहने पर सदन स्थान रिक्त घोषित कर सकता है; सत्रावसान तथा लगातार चार दिन से अधिक स्थगन की अवधि गणना से बाहर।
अनुच्छेद 102(1)
अयोग्य लाभ-पद; सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित; अनुन्मोचित दिवालिया; नागरिकता/विदेशी निष्ठा; अथवा संसद के कानून से अयोग्यता।
अनुच्छेद 102(2)
दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता।
अनुच्छेद 103 निर्णय
बैठे सदस्य के अनुच्छेद 102(1) वाले प्रश्न पर राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेकर उसी के अनुसार कार्य करता है।
गलत ढंग से बैठना/मत देना
अनुच्छेद 104 शपथ से पहले, जानते हुए अयोग्य/निरर्ह होने या कानूनी रोक के बावजूद बैठने/मत देने के प्रत्येक दिन ₹500 दंड लगाता है।
14. संसदीय विशेषाधिकार: अनुच्छेद 105
विशेषाधिकार प्रत्येक सदन, उसकी समितियों और सदस्यों को स्वतंत्र तथा प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए है—व्यक्ति को सामान्य कानून से ऊपर रखने के लिए नहीं। अनुच्छेद 105(1) संविधान और सदन के नियमों के अधीन संसद में वाक्-स्वातंत्र्य देता है। अनुच्छेद 105(2) संसद अथवा समिति में कही बात या दिए मत के लिए सदस्य को न्यायालयी कार्यवाही से बचाता और सदन के प्राधिकार से प्रकाशित सामग्री को संरक्षण देता है।
अन्य विशेषाधिकार संसद कानून से परिभाषित कर सकती है; तब तक अनुच्छेद 105(3) 44वें संशोधन के संबंधित उपबंध के लागू होने से ठीक पहले वाली स्थिति का संदर्भ देता है। लोकसभा की आधिकारिक प्रश्नोत्तरी कहती है कि इन विशेषाधिकारों का पूर्ण संहिताकरण नहीं हुआ है।
विशेषाधिकार की संवैधानिक सीमाएँ हैं। सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024) में उच्चतम न्यायालय की सात-न्यायाधीश पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 105(2) और 194(2) भाषण या मत से जुड़ी रिश्वत के अभियोजन से विधायक/सांसद को उन्मुक्ति नहीं देते। दावा सदन के सामूहिक कामकाज और विधायी कर्तव्य की आवश्यकता से जुड़ा होना चाहिए।
15. बिहार के संदर्भ में
17. प्रारंभिक परीक्षा के भ्रम-जाल
18. आधिकारिक पूर्व प्रश्न संबंधी टिप्पणी
इस विषय पर तैयारी के समय किसी आधिकारिक बीपीएससी प्रश्न-पुस्तिका से प्रश्न की पूरी भाषा और विकल्प सत्यापित नहीं हुए, इसलिए कोई प्रश्न आधिकारिक पूर्व प्रश्न के रूप में पुनःप्रस्तुत नहीं है। नीचे के प्रश्न मौलिक बीपीएससी-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।
20. अभ्यास: ठीक 20 बीपीएससी प्रारंभिक परीक्षा-शैली बहुविकल्पीय प्रश्न