प्रश्नों में नियुक्ति और निर्वाचन का अंतर, पाँच वर्ष की अवधि तथा राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद, अर्हताएँ, शपथ, सहायता-सलाह, सदन बुलाना, विधेयकों पर अनुमति, अध्यादेश, क्षमादान और उन्मुक्ति बार-बार आते हैं। बिहार से जुड़े प्रश्न द्विसदनीय विधानमंडल, विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल की वैधानिक भूमिका, बिहार के अध्यादेश-मामलों अथवा 2005 के विधानसभा-विघटन पर आधारित हो सकते हैं।
हर शक्ति पर यह कसौटी लगाएँ: किस अनुच्छेद से शक्ति मिली → सहायता-सलाह से या विवेक से → शर्त क्या है → विधिक परिणाम क्या होगा → न्यायिक समीक्षा कितनी है। राज्यपाल में निहित हर शक्ति को उसकी व्यक्तिगत शक्ति न मानें।
2. संवैधानिक स्थिति: राज्य का प्रमुख, समानांतर सरकार नहीं
अनुच्छेद 154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित करता है, जिसका प्रयोग वह संविधान के अनुसार स्वयं या अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। अनुच्छेद 163 में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए है, सिवाय उन बातों के जिनमें संविधान विवेक की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 164 मंत्रिपरिषद को विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है।
इसलिए “कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है” का अर्थ यह नहीं कि राज्यपाल सामान्यतः निर्वाचित मंत्रियों के बिना शासन करता है। संसदीय शासन संबंधी उच्चतम न्यायालय के सिद्धांत में राज्य प्रशासन के विशाल क्षेत्र में राज्यपाल संवैधानिक अथवा औपचारिक प्रमुख है। विवेक संविधान से निकला सीमित अपवाद है, असीम राजनीतिक इच्छा नहीं।
3. मुख्य अनुच्छेद मानचित्र
अनुच्छेद
विषय
परीक्षा संकेत
153
प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल; एक व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।
साझा राज्यपाल संवैधानिक रूप से संभव।
154
राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित।
अनुच्छेद 163 की सहायता-सलाह के साथ पढ़ें।
155–156
राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति; पदावधि, प्रसादपर्यंत पद, त्यागपत्र और निरंतरता।
नियुक्त होता है, निर्वाचित नहीं।
157–159
अर्हताएँ, पद की शर्तें और शपथ।
नागरिक + 35 वर्ष; उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
160
अनिर्दिष्ट आकस्मिकता में कृत्यों के निर्वहन की व्यवस्था राष्ट्रपति करता है।
विशेष आकस्मिकता।
161
राज्य कार्यपालिका के क्षेत्र वाले कानूनों के अपराधों में क्षमादान आदि।
राष्ट्रपति के अनुच्छेद 72 के क्षेत्र के समान नहीं।
163–164
मंत्रिपरिषद; मुख्यमंत्री/मंत्रियों की नियुक्ति; उत्तरदायित्व।
संसदीय राज्य कार्यपालिका।
166–167
राज्य-कार्य का संचालन और राज्यपाल के प्रति मुख्यमंत्री के कर्तव्य।
राज्यपाल के नाम से आदेश; सूचना का संवैधानिक मार्ग।
174–176
सत्र, सत्रावसान, विघटन, संदेश और अभिभाषण।
सामान्यतः सलाह से।
200–201
राज्य विधेयक और राष्ट्रपति के लिए आरक्षित विधेयक।
केवल गैर-धन विधेयक लौट सकता है।
213
राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति।
विधानमंडल सत्र में न होने पर अस्थायी कानून।
356 और 361
संवैधानिक तंत्र-विफलता पर प्रतिवेदन; व्यक्तिगत संवैधानिक उन्मुक्तियाँ।
प्रतिवेदन/कार्रवाई संवैधानिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर नहीं।
4. नियुक्ति, पदावधि और अर्हताएँ
बिंदु
संवैधानिक नियम
सामान्य जाल
नियुक्ति
राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से राज्यपाल नियुक्त करता है।
कोई निर्वाचक मंडल राज्यपाल नहीं चुनता।
पदावधि
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद; उसके अधीन पदग्रहण से पाँच वर्ष की अवधि।
पाँच वर्ष हर हालत में सुरक्षित अवधि नहीं।
त्यागपत्र
राष्ट्रपति को संबोधित लिखित त्यागपत्र।
मुख्यमंत्री या मुख्य न्यायाधीश को नहीं।
निरंतरता
अवधि पूरी होने के बाद उत्तराधिकारी के पदग्रहण तक पद पर बना रहता है।
पाँचवीं वर्षगाँठ पर पद अपने-आप रिक्त नहीं होता।
अर्हताएँ
भारत का नागरिक और 35 वर्ष की आयु पूरी।
उसी राज्य का निवासी होना संविधान की शर्त नहीं।
विधानमंडलीय सदस्यता
संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता; पदग्रहण पर स्थान रिक्त माना जाता है।
मानी गई रिक्ति के लिए अलग सदस्यता-त्यागपत्र आवश्यक नहीं।
अन्य पद
कोई दूसरा लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
संवैधानिक पद के साथ सामान्य वेतनभोगी सार्वजनिक पद नहीं।
उपलब्धियाँ
पदावधि में कम नहीं की जा सकतीं; साझा राज्यपाल की लागत का राज्यों में बँटवारा राष्ट्रपति तय करता है।
संसद विधि से उपलब्धियाँ निर्धारित करती है।
5. शपथ, रिक्ति और साझा राज्यपाल
अनुच्छेद 159 में राज्यपाल निष्ठापूर्वक पद-कार्य करने, संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहने की शपथ लेता है। शपथ संबंधित राज्य पर अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, अथवा उनकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष होती है।
अनुच्छेद 153 एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बनने की स्पष्ट अनुमति देता है। अनुच्छेद 160 ऐसी आकस्मिकता में राष्ट्रपति को कृत्यों के निर्वहन की व्यवस्था करने देता है, जिसका संविधान में अन्यथा प्रबंध न हो। इससे कोई निर्वाचित कार्यवाहक राज्यपाल का पद नहीं बनता।
6. सहायता, सलाह और विवेक
श्रेणी
उदाहरण
नियंत्रक सिद्धांत
सामान्यतः सहायता-सलाह पर
दैनिक कार्यपालिका कार्रवाई, विधानमंडल बुलाना/सत्रावसान, नीतिगत निर्णय, राज्यपाल के नाम से होने वाली अधिकांश नियुक्तियाँ।
निर्वाचित मंत्रिपरिषद शासन करती और विधानसभा को उत्तर देती है।
स्पष्ट अथवा संविधान-अपेक्षित विवेक
निर्दिष्ट संवैधानिक उपबंध; अनुच्छेद 200 के विकल्पों पर वर्तमान उच्चतम न्यायालय परामर्श; दूसरे परंतुक में अनिवार्य आरक्षण।
विवेक पाठ, उद्देश्य और संवैधानिक सीमाओं के भीतर।
परिस्थितिजन्य संवैधानिक निर्णय
स्पष्ट बहुमत न होने पर मुख्यमंत्री नियुक्त करना; सदन में बहुमत सिद्ध कराना; अनुच्छेद 356 का प्रतिवेदन।
वस्तुनिष्ठ सामग्री, प्रतिनिधि शासन और सदन-परीक्षण—व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद नहीं।
केवल हस्ताक्षर से विवेकाधीन नहीं
अनुच्छेद 166 में राज्यपाल के नाम से प्रमाणित आदेश, मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्री-नियुक्ति, सामान्य प्रशासन।
औपचारिक नाम और व्यक्तिगत निर्णय अलग बातें हैं।
7. राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ
शक्ति
कैसे चलती है
परीक्षा सावधानी
नियुक्तियाँ
राज्यपाल मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्री नियुक्त करता है। संविधान अलग अनुच्छेदों में महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग सदस्यों और जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के कार्य भी देता है।
हर पद की अर्हता और हटाने का नियम अलग है।
कार्यपालिका कार्रवाई
अनुच्छेद 166 में राज्य सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से व्यक्त होगी; नियम के अनुसार आदेश अधिप्रमाणित होंगे।
राज्यपाल के नाम का आदेश व्यक्तिगत विवेक का प्रमाण नहीं।
कार्य-संचालन नियम
राज्यपाल सरकारी कार्य की सुविधाजनक व्यवस्था और मंत्रियों में आवंटन के नियम बनाता है, विवेक वाले संवैधानिक कार्यों को छोड़कर।
मंत्रिपरिषद राजनीतिक रूप से उत्तरदायी रहती है।
सूचना
अनुच्छेद 167 में मुख्यमंत्री परिषद के निर्णय और विधायी प्रस्ताव बताता, माँगी सूचना देता और राज्यपाल के कहने पर किसी मंत्री का निर्णय परिषद के सामने रखता है।
सूचना माँगना समानांतर मंत्रिमंडल बनाना नहीं।
राज्य क्षमादान
अनुच्छेद 161 उन कानूनों के अपराधों पर लागू है जिनके विषय तक राज्य कार्यपालिका शक्ति फैली है।
क्षेत्र केवल कारागार के स्थान से तय नहीं होता।
8. विधायी शक्तियाँ और कर्तव्य
उपबंध
कार्य
मुख्य सीमा
अनुच्छेद 174
सदन/सदनों को बुलाता, सत्रावसान करता और विधानसभा भंग कर सकता है।
एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले की पहली बैठक में छह माह से अधिक अंतर नहीं; सामान्यतः मंत्री-सलाह पर प्रयोग।
अनुच्छेद 175
सदन/सदनों को संबोधित और संदेश भेज सकता है।
सदन संदेश में अपेक्षित विषय पर सुविधानुसार शीघ्र विचार करता है।
अनुच्छेद 176
हर आम चुनाव के बाद पहला सत्र और हर वर्ष का पहला सत्र—विशेष अभिभाषण।
हर सामान्य सत्र में यह विशेष अभिभाषण नहीं होता।
अनुच्छेद 171
विधान परिषद वाले राज्य में संवैधानिक क्षेत्रों से परिषद के एक-छठे सदस्य नामित करता है।
बिहार में विधान परिषद है; नामांकन विधानसभा के लिए नहीं।
अनुच्छेद 200–201
राज्य विधानमंडल से पारित विधेयक और राष्ट्रपति-आरक्षण पर कार्रवाई।
अनुच्छेद 200 के पहले परंतुक में धन विधेयक पुनर्विचार को नहीं लौट सकता।
अनुच्छेद 213
संवैधानिक शर्त पूरी होने पर अध्यादेश जारी करता है।
अस्थायी विधायी शक्ति, नियमित सत्र का विकल्प नहीं।
10. विधेयक पर अनुमति की वर्तमान स्थिति—20 नवंबर 2025 का उच्चतम न्यायालय परामर्श
In re: Assent, Withholding or Reservation of Bills by the Governor and the President of India (2025 INSC 1333) में संविधान पीठ ने अनुच्छेद 200 के तीन विकल्प बताए: अनुमति देना; राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना; अथवा गैर-धन विधेयक की अनुमति रोककर टिप्पणियों सहित लौटाना। पीठ के अनुसार इन विकल्पों में चयन राज्यपाल के विवेक का प्रयोग है और विधेयक के कानून बनने से पहले उसके गुण-दोष की न्यायिक समीक्षा नहीं होगी।
न्यायालय ने यह भी कहा कि लंबे, अस्पष्टीकृत और अनिश्चित निष्क्रियता की स्थिति में संवैधानिक न्यायालय सीमित परमादेश देकर राज्यपाल को अनुच्छेद 200 का कार्य पूरा करने को कह सकता है, किंतु परिणाम नहीं बताएगा। न्यायालय ने अपने बनाए निश्चित समय-बंधन और अनुच्छेद 142 के अंतर्गत “मानी गई अनुमति” को अस्वीकार किया। अनुच्छेद 361 राज्यपाल को व्यक्तिगत उन्मुक्ति देता है, पर संवैधानिक पद की इतनी सीमित समीक्षा समाप्त नहीं करता। इसलिए पुराने नोटों के निश्चित न्यायिक समय-बंधन को वर्तमान नियम न मानें।
11. अनुच्छेद 201: राष्ट्रपति के लिए आरक्षित विधेयक
चरण
संवैधानिक नियम
राष्ट्रपति का विकल्प
राष्ट्रपति अनुमति देने या अनुमति रोकने की घोषणा करता है।
गैर-धन विधेयक
राष्ट्रपति राज्यपाल को संदेश सहित विधेयक सदन/सदनों को लौटाने का निर्देश दे सकता है।
राज्य पुनर्विचार
संदेश मिलने के छह माह के भीतर सदन/सदनों को पुनर्विचार करना होगा।
फिर पारित आरक्षित विधेयक
फिर पारित होने पर राष्ट्रपति के विचार हेतु पुनः प्रस्तुत; अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति को अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं करता।
12. अनुच्छेद 213 की अध्यादेश शक्ति
बिंदु
नियम
कब उपलब्ध?
विधानसभा सत्र में न हो; द्विसदनीय राज्य में दोनों सदन एक साथ सत्र में न हों—अर्थात् एक या दोनों सत्र से बाहर हों—और तत्काल कार्रवाई आवश्यक मानी जाए।
प्रभाव
संवैधानिक सीमाओं के अधीन राज्यपाल की अनुमति पाए राज्य अधिनियम जैसी शक्ति और प्रभाव।
विधानमंडलीय नियंत्रण
विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य; पुनः बैठक से छह सप्ताह बाद, या संवैधानिक अस्वीकृति-संकल्प पर पहले, समाप्त।
वापसी
राज्यपाल कभी भी वापस ले सकता है; सामान्य क्रम में यह मंत्रिपरिषद की सलाह पर संवैधानिक रूप से चलता है।
राष्ट्रपति के निर्देश
उन श्रेणियों में जारी करने से पहले चाहिए जिनमें समान विधेयक को राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति, अनिवार्य आरक्षण अथवा वैधता के लिए राष्ट्रपति की अनुमति चाहिए होती।
न्यायिक नियंत्रण
संतोष और प्रयोग संवैधानिक समीक्षा के अधीन; विधानमंडल को दरकिनार करने वाला नियमित पुनःप्रख्यापन अनुमत नहीं।
13. बिहार और अध्यादेश संबंधी निर्णय
डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) बिहार में अध्यादेशों के बार-बार पुनःप्रख्यापन से जुड़ा था। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कार्यपालिका आपात शक्ति के सहारे विधानमंडल का कानून बनाने का कार्य अपने हाथ में लेकर लोकतांत्रिक अधिनियमन को बार-बार दरकिनार नहीं कर सकती। किसी नई असाधारण परिस्थिति को नियमित “अध्यादेश राज” से न मिलाएँ।
कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) ने दोहराया कि पुनःप्रख्यापन संविधान पर कपट है और अध्यादेश को विधानमंडल के समक्ष रखना संवैधानिक दायित्व है। न्यायालय ने इस व्यापक धारणा को अस्वीकार किया कि हर समाप्त अध्यादेश से बने सभी अधिकार-दायित्व अपने-आप स्थायी रहेंगे; परिणाम और लोकहित का उपचार संवैधानिक न्यायिक जाँच माँगता है।
14. क्षमादान: राज्यपाल और राष्ट्रपति
विशेषता
राज्यपाल—अनुच्छेद 161
राष्ट्रपति—अनुच्छेद 72
मूल कार्य
अपने क्षेत्र में क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार, निलंबन या लघुकरण।
संवैधानिक रूप से निर्दिष्ट क्षेत्रों में यही क्षमा-रूप।
विषय-संबंध
उस कानून का अपराध, जिसका विषय राज्य कार्यपालिका शक्ति के भीतर है।
संघ कार्यपालिका-कानून क्षेत्र, सैन्य न्यायालय और मृत्युदंड का स्पष्ट खंड।
प्रयोग
राज्य मंत्रिपरिषद की सहायता-सलाह पर संवैधानिक शक्ति।
संघ मंत्रिपरिषद की सहायता-सलाह पर संवैधानिक शक्ति।
समीक्षा
दुर्भावना, अप्रासंगिक विचार, मनमानी या अन्य संवैधानिक अवैधता पर सीमित न्यायिक समीक्षा; न्यायालय नया क्षमादान प्राधिकारी नहीं बनता।
15. सरकार गठन, बहुमत और सदन-परीक्षण
स्पष्ट बहुमत वाले चुनाव के बाद उस बहुमत का नेतृत्व कर सकने वाले व्यक्ति की नियुक्ति सीधी है। त्रिशंकु विधानसभा में राज्यपाल को निष्पक्ष संवैधानिक आकलन करना चाहिए कि कौन विश्वास प्राप्त कर सकता है; वह बहुमत बनाता या निजी रूप से राजनीतिक वैधता तय नहीं करता। विवादित बहुमत सिद्ध करने का सामान्य उचित स्थान विधानसभा का पटल है।
विश्वसनीय सामग्री से मंत्रालय के विश्वास खोने का प्रश्न उठे तो शीघ्र सदन-परीक्षण आवश्यक हो सकता है। राज्यपाल अध्यक्ष का स्थान नहीं ले सकता, राजनीतिक लाभ के लिए सामान्य विधायी कार्यसूची तय नहीं कर सकता और जहाँ सदन विश्वास तय कर सकता है वहाँ निजी प्रतिवेदन को सदन-परीक्षण का विकल्प नहीं बना सकता।
16. अनुच्छेद 356 का प्रतिवेदन और बिहार का 2005 विघटन
अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति राज्यपाल के प्रतिवेदन पर या अन्यथा कार्रवाई कर सकता है; अतः प्रतिवेदन अनिवार्य नहीं। वह समीक्षा से परे निर्णायक प्रमाण भी नहीं। इस निष्कर्ष के लिए वस्तुनिष्ठ सामग्री चाहिए कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती।
रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में उच्चतम न्यायालय ने 23 मई 2005 की बिहार विधानसभा-विघटन उद्घोषणा को असंवैधानिक माना। नया चुनाव बहुत आगे बढ़ चुका था, इसलिए न्यायालय ने भंग विधानसभा बहाल नहीं की। निर्णय उद्घोषणा की सामग्री की न्यायिक समीक्षा और अवैधता घोषित करने तथा व्यावहारिक उपचार चुनने के अंतर—दोनों को दिखाता है।
17. अनुच्छेद 361: व्यक्तिगत उन्मुक्ति और आधिकारिक उत्तरदायित्व
संरक्षण
नियम
आधिकारिक जवाबदेही
राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग के लिए न्यायालय को उत्तरदायी नहीं।
दांडिक कार्यवाही
पदावधि में राज्यपाल के विरुद्ध दांडिक कार्यवाही संस्थित या जारी नहीं रह सकती।
गिरफ्तारी या कारावास
पदावधि में गिरफ्तारी या कारावास की न्यायिक प्रक्रिया जारी नहीं होगी।
व्यक्तिगत दीवानी कार्यवाही
व्यक्तिगत कार्य पर पदावधि में दीवानी वाद के लिए संवैधानिक विवरण वाली लिखित सूचना के दो माह बाद ही कार्यवाही।
सरकारी कार्रवाई
अनुच्छेद 361 संघ/राज्य सरकार के विरुद्ध उचित कार्यवाही का अधिकार नहीं रोकता और उचित प्रक्रिया से संवैधानिक वैधता की समीक्षा समाप्त नहीं करता।
18. राज्यपाल और राष्ट्रपति: महत्त्वपूर्ण तुलना
बिंदु
राज्यपाल
राष्ट्रपति
आने की विधि
राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त।
संवैधानिक निर्वाचक मंडल से अप्रत्यक्ष निर्वाचन।
हटाना
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत; महाभियोग नहीं।
संविधान उल्लंघन पर महाभियोग से हटाया जा सकता है।
न्यूनतम आयु
35 वर्ष।
35 वर्ष।
सहायता-सलाह
मुख्यमंत्री-प्रधान राज्य मंत्रिपरिषद।
प्रधानमंत्री-प्रधान संघ मंत्रिपरिषद।
अध्यादेश
राज्य विधायी क्षेत्र और शर्तों के लिए अनुच्छेद 213।
संसदीय विधायी क्षेत्र और शर्तों के लिए अनुच्छेद 123।
विधेयक
राज्य विधेयक राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकता; उच्च न्यायालय-शक्ति वाली निर्दिष्ट दशा में अनिवार्य।
अनुच्छेद 111 और 201 में कार्य; संघ विधेयक राज्यपाल को आरक्षित नहीं करता।
शपथ कौन दिलाता है
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश/उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश।
भारत के मुख्य न्यायाधीश/उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश।
उन्मुक्ति
अनुच्छेद 361 दोनों को पदावधि में समान प्रकार की व्यक्तिगत सुरक्षा देता है।
19. सत्यापित न्यायिक समयरेखा
20. बिहार के लिए महत्त्व
22. प्रारंभिक परीक्षा के जाल
23. आधिकारिक पूर्व प्रश्न की स्थिति
इस तैयारी में किसी प्रश्न का पूरा पाठ और सभी विकल्प आधिकारिक BPSC प्रश्न-पुस्तिका से सत्यापित नहीं हुए, इसलिए यहाँ किसी को आधिकारिक पूर्व प्रश्न नहीं कहा गया है। नीचे के प्रश्न मौलिक BPSC-शैली अभ्यास प्रश्न हैं।