BPSC · Polity

राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व और मौलिक कर्तव्य

40 min read · Updated 5 Oct 2026

1. BPSC की माँग

नीति-निदेशक तत्त्व सामाजिक न्याय, पंचायती राज, लोक स्वास्थ्य, शिक्षा, सहकारिता और बिहार के शासन-विषयों से सीधे जुड़े हैं। सबसे आम भूलें हैं—इन्हें मौलिक अधिकार मान लेना, पाठ्य-पुस्तक वाले वर्गीकरण को संवैधानिक वर्गीकरण मानना और अनुच्छेद 45 को 21A से मिला देना।

2. मौलिक अधिकार, नीति-निदेशक तत्त्व और कर्तव्य

आधारमौलिक अधिकारनीति-निदेशक तत्त्वमौलिक कर्तव्य
स्थानभाग IIIभाग IV, अनु. 36–51भाग IVA, अनु. 51A
मुख्य लक्ष्यसंरक्षित अधिकार और स्वतंत्रताएँराज्य के सामाजिक, आर्थिक और शासन-लक्ष्यनागरिकों के नागरिक कर्तव्य
प्रत्यक्ष न्यायिक प्रवर्तनहाँ, संवैधानिक सीमाओं के अधीननहीं; अनु. 37 के अनुसार किसी न्यायालय से प्रवर्तनीय नहींकर्तव्य तोड़ने पर सीधे संवैधानिक उपचार नहीं
महत्त्वन्यायालय से लागू होने वाले अधिकारशासन में मूलभूत; कानून बनाते समय राज्य लागू करेहर नागरिक की संवैधानिक अपेक्षा

3. अनुच्छेद 36 और 37: आधार

अनुच्छेद 36: भाग IV में “राज्य” का अर्थ भाग III जैसा ही है, जब तक संदर्भ अन्यथा न हो। अनुच्छेद 37: नीति-निदेशक तत्त्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं; फिर भी वे देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।

अतः सही उत्तर है: केवल अनुच्छेद IV में होने से कोई व्यक्ति न्यायालय से नीति-निदेशक तत्त्व लागू नहीं करा सकता, लेकिन सरकार इन्हें असंगत या महत्वहीन नहीं कह सकती।

4. अनुच्छेद 38–51: पूरा मानचित्र

अनुच्छेदनिर्देशस्मरण संकेत
38न्याय से अनुप्राणित सामाजिक व्यवस्था से लोककल्याण और असमानताएँ कम करना।सामाजिक व्यवस्था
39पर्याप्त जीविका, संसाधन सामान्य हित के लिए, धन-संकेंद्रण रोकना, समान वेतन, श्रमिक/बालक सुरक्षा।आर्थिक न्याय
39Aसमान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।विधिक सहायता
40ग्राम पंचायतों का संगठन और स्वशासन-इकाई के लिए शक्तियाँ।पंचायत
41आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमा में काम, शिक्षा और निर्दिष्ट दशाओं में लोक सहायता।सामर्थ्य-आधारित सहायता
42काम की न्यायसंगत और मानवीय दशाएँ तथा प्रसूति सहायता।काम और मातृत्व
43श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी, जीवन का अच्छा स्तर; ग्रामीण कुटीर उद्योग।मजदूरी और कुटीर उद्योग
43Aउद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी।भागीदारी
43Bसहकारी समितियों का स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्य, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंध।सहकारिता
44नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता का प्रयास।UCC
45सभी बच्चों के छह वर्ष पूरे करने तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा।छह से कम
46SC, ST और अन्य दुर्बल वर्गों के शैक्षिक/आर्थिक हित; सामाजिक अन्याय और शोषण से रक्षा।दुर्बल वर्ग
47पोषण, जीवन स्तर, लोक स्वास्थ्य; हानिकारक मादक पेय/द्रव्य के निषेध का प्रयास।पोषण और स्वास्थ्य
48वैज्ञानिक कृषि/पशुपालन, नस्लों का संरक्षण-सुधार और निर्दिष्ट वध-निषेध।कृषि और पशु
48Aपर्यावरण, वन और वन्यजीव का संरक्षण और सुधार।पर्यावरण
49राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारक, स्थान और वस्तु की रक्षा।स्मारक
50राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।पृथक्करण
51अंतरराष्ट्रीय शांति, सम्मानजनक संबंध, अंतरराष्ट्रीय विधि/संधि का सम्मान और मध्यस्थता।विश्व शांति

5. पढ़ने में सहायक वर्गीकरण—संविधान का नहीं

संविधान ने नीति-निदेशक तत्त्वों को समाजवादी, गांधीवादी या उदार-बौद्धिक नाम से विभाजित नहीं किया है। यह केवल पढ़ने का तरीका है; यदि विकल्प कहे कि ये संविधान के औपचारिक शीर्षक हैं, तो वह गलत है।

6. संशोधन समयरेखा

7. मौलिक कर्तव्य: अनुच्छेद 51A

अनुच्छेद 51A आरम्भ होता है—“भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा…”। कुल 11 कर्तव्य हैं। पहले दस 42वें संशोधन से आए; ग्यारहवाँ खंड (k) 86वें संशोधन से आया। ये सीधे न्यायालय द्वारा कर्तव्य के रूप में लागू नहीं कराए जाते, किंतु सक्षम विधायिका संबद्ध विषय पर कानून बना सकती है।

खंडसंक्षेप में कर्तव्य
(a)संविधान का पालन; आदर्शों/संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर।
(b)स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों का पालन।
(c)भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा।
(d)देश की रक्षा और आह्वान पर राष्ट्रीय सेवा।
(e)सद्भाव और भ्रातृत्व; स्त्रियों की गरिमा के प्रतिकूल प्रथाओं का त्याग।
(f)समन्वित संस्कृति की समृद्ध विरासत का संरक्षण।
(g)प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा/सुधार और जीवों के प्रति दया।
(h)वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा जिज्ञासा और सुधार की भावना।
(i)लोक संपत्ति की रक्षा और हिंसा का त्याग।
(j)व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष का प्रयत्न।
(k)माता-पिता/संरक्षक द्वारा 6–14 वर्ष के बालक/प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर।

9. बिहार विशेष

अनुच्छेद 40 BPSC के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह राज्य को ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाई के रूप में संगठित करने का निर्देश देता है। बिहार के पंचायती राज की विस्तृत व्यवस्था भाग IX और बिहार कानून से पढ़ी जाएगी, पर नीति की संवैधानिक पृष्ठभूमि अनुच्छेद 40 है। अनुच्छेद 39A, 46, 47 और 48A बिहार में विधिक सहायता, दुर्बल-वर्ग कल्याण, लोक स्वास्थ्य और पर्यावरण के संवैधानिक नीति-दृष्टिकोण भी देते हैं।

13. अभ्यास: 20 BPSC प्रारंभिक परीक्षा-स्तर के बहुविकल्पीय प्रश्न