1. BPSC की माँग: पद, शक्ति और उत्तरदायित्व में अंतर
BPSC छोटे संवैधानिक वाक्यों को कथन-आधारित प्रश्न में बदलता है—क्या राज्यपाल विधानमंडल का अंग है? मंत्रिपरिषद किस सदन के प्रति उत्तरदायी है? क्या विधान परिषद धन विधेयक रोक सकती है? किसी विधेयक को धन विधेयक कौन तय करता है? बिहार विधान परिषद की 75 सीटें कैसे बँटी हैं? सही विधि है—औपचारिक कार्य कौन करता है, किसकी सलाह पर करता है, उत्तरदायित्व किस सदन के सामने है और संवैधानिक सीमा क्या है।
एक कार्य-श्रृंखला याद रखें: मतदाता → 243 सदस्यीय विधान सभा → बहुमत का समर्थन → मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद → कार्यकारी नीति → विधानमंडल के सामने विधेयक/बजट → सदनों और समितियों द्वारा जाँच → अनुमति और क्रियान्वयन।
3. राज्यपाल: संवैधानिक मानचित्र
अनुच्छेद
नियम
परीक्षा-संकेत
153
प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल होगा; एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।
एक व्यक्ति का अनेक राज्यों के लिए नियुक्त होना संवैधानिक है।
154
राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है और संविधान के अनुसार उसके द्वारा सीधे या अधीनस्थ अधिकारियों से प्रयोग होती है।
औपचारिक निहितता का अर्थ राज्यपाल का निजी शासन नहीं।
155
राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र से राज्यपाल नियुक्त करता है।
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव नहीं होता।
156
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण; बताई गई अवधि पाँच वर्ष और उत्तराधिकारी के पद ग्रहण तक निरंतरता।
पाँच वर्ष पूर्ण पद-सुरक्षा नहीं है।
157
भारत का नागरिक और कम-से-कम 35 वर्ष की आयु।
बिहार का निवासी होना आवश्यक नहीं।
159
शपथ उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, अथवा अनुपस्थिति में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है जिसका अधिकार क्षेत्र राज्य में है।
मुख्यमंत्री शपथ नहीं दिलाता।
161
राज्य की कार्यपालिका शक्ति के क्षेत्र से संबंधित कानूनों के विरुद्ध अपराधों में क्षमादान आदि की शक्ति।
क्षेत्र राज्य की कार्यपालिका सीमा से जुड़ा है।
4. नाममात्र का प्रमुख और वास्तविक कार्यपालिका
राज्यपाल
मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद
संवैधानिक प्रमुख; कार्यकारी कार्रवाई औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम से होती है।
राजनीतिक कार्यपालिका, जो नीति बनाती है और सामान्यतः सहायता-सलाह देती है।
मुख्यमंत्री को नियुक्त करता है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है।
विधान सभा का विश्वास बनाए रखना होता है।
संविधान के अधीन सदनों को बुलाता, सत्रावसित करता और विधान सभा भंग कर सकता है।
मंत्रिमंडल सामान्यतः विधायी कार्यक्रम तय करता और सत्र बुलाने अथवा विघटन की सलाह देता है, संवैधानिक स्थितियों के अधीन।
अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री से सूचना माँग सकता है।
मुख्यमंत्री मंत्रिमंडलीय निर्णय और सूचना देता तथा किसी मंत्री के निर्णय को मंत्रिपरिषद के सामने रखने का दायित्व निभाता है।
5. मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद
नियम
सटीक स्थिति
नियुक्ति
राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है; अन्य मंत्री मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल नियुक्त करता है।
सामूहिक उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है, विधान परिषद के प्रति नहीं।
आकार
मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधान सभा की सदस्य-संख्या के 15% से अधिक और 12 से कम नहीं हो सकती।
बिहार की अधिकतम सीमा
243 का 15% 36.45 है; सदस्य-संख्या भिन्न में नहीं हो सकती और सीमा से अधिक भी नहीं, इसलिए मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 36 मंत्री हो सकते हैं।
गैर-सदस्य
जो मंत्री लगातार छह महीने तक किसी भी राज्य सदन का सदस्य नहीं बनता, उसका मंत्री पद समाप्त हो जाता है।
द्विसदनीय परिणाम
मुख्यमंत्री या मंत्री बिहार के किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है, पर सरकार तभी रहती है जब उसे विधान सभा का विश्वास प्राप्त हो।
उपमुख्यमंत्री
संविधान उपमुख्यमंत्री का अलग पद या विशेष संवैधानिक शक्ति नहीं बनाता; विधिक रूप से वह मंत्री होता है।
7. बिहार सरकार के कार्य का संचालन
अनुच्छेद
संचालन नियम
166(1)
राज्य सरकार की सभी कार्यकारी कार्रवाइयाँ राज्यपाल के नाम से की हुई कही जाती हैं।
166(2)
आदेश और लिखत नियमों से निर्धारित विधि में प्रमाणित होते हैं; उचित प्रमाणीकरण के बाद उनकी वैधता केवल इस आधार पर नहीं चुनौती जा सकती कि राज्यपाल ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं बनाया।
166(3)
संवैधानिक विवेक वाले मामलों को छोड़कर राज्यपाल सरकारी काम के सुविधाजनक संचालन और मंत्रियों में आवंटन के लिए नियम बनाता है।
167
मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद के निर्णय बताता, माँगी गई सूचना देता और आवश्यक होने पर किसी मंत्री के अकेले निर्णय को मंत्रिपरिषद के सामने रखता है।
8. बिहार विधान सभा: सत्यापित परिचय
विशेषता
स्थिति
कुल निर्वाचन क्षेत्र
243 एक-सदस्यीय विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र।
आरक्षित सीटें
वर्तमान परिसीमन में 38 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित।
चुनाव
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित प्रत्यक्ष चुनाव; सर्वाधिक मत पाने वाला प्रत्याशी निर्वाचित।
सामान्य अवधि
पहली बैठक के लिए निर्धारित तिथि से पाँच वर्ष, यदि पहले भंग न हो; आपात विस्तार अनुच्छेद 172 के अधीन।
पीठासीन अधिकारी
अनुच्छेद 178 के अंतर्गत विधान सभा द्वारा चुने गए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष।
राजनीतिक भूमिका
विश्वास, अनुदान और धन विधेयक पर निर्णायक; मंत्रिपरिषद इसी के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी।
9. बिहार विधान परिषद: 75 सदस्यों का सटीक वितरण
मार्ग
सीटें
निर्वाचन या मनोनयन कौन करता है?
विधान सभा सदस्य निर्वाचन वर्ग
27
बिहार विधान सभा के सदस्य ऐसे व्यक्तियों को चुनते हैं जो स्वयं विधान सभा सदस्य नहीं हैं।
स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र
24
संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के निर्दिष्ट स्थानीय प्राधिकारियों के सदस्य।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र
6
कानून में निर्धारित स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की शर्तें पूरी करने वाले पंजीकृत मतदाता।
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र
6
कानून में निर्धारित अध्यापन संबंधी शर्तें पूरी करने वाले पंजीकृत मतदाता।
राज्यपाल का मनोनयन
12
साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन या समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति।
कुल
75
63 निर्वाचित + 12 मनोनीत
10. विधान सभा और विधान परिषद की तुलना
पक्ष
विधान सभा
विधान परिषद
लोकतांत्रिक आधार
क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष चुनाव।
अप्रत्यक्ष/कार्यात्मक निर्वाचन क्षेत्र और मनोनयन।
सदस्यता की न्यूनतम आयु
25 वर्ष।
30 वर्ष।
अवधि
सामान्यतः पाँच वर्ष; भंग हो सकती है।
स्थायी सदन; भंग नहीं होती, लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष निवृत्त।
पीठासीन अधिकारी
अध्यक्ष।
सभापति।
सरकार का उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद इसके प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी।
जाँच कर सकती है, पर अविश्वास से सरकार नहीं हटा सकती।
धन विधेयक
केवल यहीं आरंभ; परिषद की सिफारिशों पर अंतिम निर्णय।
14 दिनों के भीतर सिफारिश कर सकती है।
साधारण विधेयक
अनुच्छेद 197 की प्रक्रिया से अंततः परिषद के विलंब पर प्रभावी हो सकती है।
पुनर्विचार और विलंब कर सकती है, पूर्ण निषेधाधिकार नहीं।
संयुक्त बैठक
राज्य विधानमंडल के गतिरोध के समाधान के लिए संविधान में संयुक्त बैठक नहीं है।
11. सदस्यता, शपथ, मतदान और गणपूर्ति
अनुच्छेद
नियम
173
नागरिकता और निर्धारित शपथ/प्रतिज्ञान आवश्यक; कानून के अनुसार विधान सभा के लिए न्यूनतम आयु 25 और परिषद के लिए 30 वर्ष।
188
सदस्य स्थान ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के सामने शपथ अथवा प्रतिज्ञान करता है।
189(1)
प्रश्न सामान्यतः उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से तय होते हैं; मत बराबर होने पर पीठासीन अधिकारी निर्णायक मत देता है, प्रारंभिक साधारण मत नहीं।
189(3)
जब तक राज्य कानून अन्यथा न बनाए, गणपूर्ति दस सदस्य या कुल सदस्य-संख्या का दसवाँ भाग—जो अधिक हो—है।
190–193
स्थान रिक्त होना, अयोग्यता संबंधी निर्णय और शपथ के बिना अथवा अयोग्य होते हुए बैठने/मतदान पर दंड।
12. पीठासीन अधिकारी और सदन की स्वतंत्रता
सदन
पद
मुख्य बात
विधान सभा
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष: अनुच्छेद 178–181।
अध्यक्ष कार्यवाही चलाता, सदन के नियमों की व्याख्या करता और अनुच्छेद 199(3) के अंतर्गत राज्य धन विधेयक पर अंतिम संवैधानिक प्रमाण देता है।
विधान परिषद
सभापति और उपसभापति: अनुच्छेद 182–185।
वे परिषद में समान पीठासीन कार्य करते हैं, किंतु विधान सभा के धन विधेयक का प्रमाण तय नहीं करते।
सचिवालय
अनुच्छेद 187 संवैधानिक/राज्य-कानून व्यवस्था के अधीन सदनों के पृथक सचिवालयीय कर्मचारियों का प्रावधान करता है।
विधायी सचिवालय कार्यपालिका विभागों से संस्थागत रूप से अलग है।
13. सत्र, अभिभाषण और भागीदारी
प्रावधान
कार्य
अनुच्छेद 174
राज्यपाल सदनों को बुलाता और सत्रावसित करता तथा विधान सभा भंग कर सकता है; एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के बीच छह महीने से अधिक अंतर नहीं।
अनुच्छेद 175
राज्यपाल किसी एक सदन या दोनों सदनों को साथ संबोधित कर सकता और संदेश भेज सकता है।
अनुच्छेद 176
हर आम चुनाव के बाद विधान सभा के पहले सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में विशेष अभिभाषण।
अनुच्छेद 177
मंत्री और महाधिवक्ता किसी भी सदन तथा संबंधित समितियों में बोल और भाग ले सकते हैं, पर केवल इस अनुच्छेद से मतदान का अधिकार नहीं मिलता।
15. धन विधेयक और वित्त विधेयक: बिहार की प्रक्रिया
पक्ष
धन विधेयक
अन्य वित्त विधेयक
संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 198–199।
अनुच्छेद 207 और साधारण विधायी प्रावधान।
प्रस्तुति
केवल विधान सभा में और राज्यपाल की सिफारिश पर।
श्रेणी के अनुसार नियम अलग; अनुच्छेद 207(1) के विषय वाला विधेयक परिषद में आरंभ नहीं हो सकता और सिफारिश अपेक्षित है।
परिषद की भूमिका
संशोधन की सिफारिश कर 14 दिन में लौटाती है; विधान सभा कोई भी सिफारिश स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
गैर-धन वित्त विधेयक पर अनुच्छेद 207 की शर्तों सहित लागू साधारण विधेयक प्रक्रिया।
प्रमाण
अनुच्छेद 199(3) में अध्यक्ष का निर्णय अंतिम; परिषद या राज्यपाल को भेजते समय प्रमाण अंकित होता है।
धन विधेयक प्रमाण नहीं होता।
16. बजट और वित्तीय नियंत्रण
चरण
संवैधानिक कार्य
वार्षिक वित्तीय विवरण—अनुच्छेद 202
राज्य की अनुमानित प्राप्तियाँ और व्यय सदन/सदनों के सामने रखे जाते हैं।
भारित व्यय
मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं होता, यद्यपि उस पर चर्चा हो सकती है।
अनुदान की माँग—अनुच्छेद 203
विधान सभा के सामने रखी जाती है; वह स्वीकार, अस्वीकार या घटा सकती है। माँग के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक है।
विनियोग विधेयक—अनुच्छेद 204
राज्य की संचित निधि से अनुदान और भारित व्यय की निकासी अधिकृत करता है।
अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान—अनुच्छेद 205
मूल स्वीकृति से बाहर या अधिक जरूरत को पूरा करते हैं।
लेखानुदान/प्रत्ययानुदान/अपवादानुदान—अनुच्छेद 206
निर्धारित परिस्थितियों में विशेष वित्तीय प्राधिकरण देता है।
17. राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति
अनुच्छेद 213 का नियम
अर्थ
कब उपलब्ध
जब राज्य विधानमंडल अनुच्छेद 213 के संवैधानिक अर्थ में सत्र में न हो और तत्काल कार्रवाई आवश्यक समझी जाए।
प्रभाव
संविधान के अधीन अध्यादेश को राज्य अधिनियम जैसी शक्ति और प्रभाव मिलता है।
विधायी नियंत्रण
उसे विधानमंडल के सामने रखना होता है और सामान्यतः पुनःसमवेशन के छह सप्ताह बाद समाप्त होता है; दोनों सदन अलग तिथि पर मिलें तो बाद की तिथि से समय गिना जाता है।
वापसी
राज्यपाल उसे वापस ले सकता है।
सीमाएँ
राज्य की विधायी क्षमता से बाहर प्रावधान नहीं बना सकता; संविधान में बताए मामलों में राष्ट्रपति के निर्देश आवश्यक होते हैं।
18. बिहार विधानमंडल कार्यपालिका को कैसे नियंत्रित करता है?
साधन
उद्देश्य
प्रश्न
सूचना लेना, देरी या असंगति उजागर करना और मंत्री का उत्तरदायित्व तय करना।
ध्यानाकर्षण/अल्पकालीन चर्चा
सदन के नियमों के अधीन अत्यावश्यक या महत्त्वपूर्ण लोक-विषय उठाना।
काम-रोको प्रस्ताव
कठोर ग्राह्यता-शर्तों के अधीन किसी निश्चित अत्यावश्यक विषय के लिए सामान्य काम रोकने का प्रयास।
अविश्वास प्रस्ताव
मंत्रिपरिषद को विधान सभा का समर्थन है या नहीं, इसकी परीक्षा; परिषद में इसका सरकार गिराने वाला समान प्रभाव नहीं।
बजट चर्चा और कटौती प्रस्ताव
अनुदान से पहले नीति और व्यय की जाँच।
सरकारी आश्वासन
सदन में मंत्रियों द्वारा किए गए वादों की पूर्ति का अनुगमन।
समिति प्रतिवेदन
लेखों, प्राक्कलनों, उपक्रमों, विशेषाधिकार और प्रशासन की समयबद्ध सदन-चर्चा से अधिक विस्तृत जाँच।
19. तीन वित्तीय समितियाँ
समिति
मुख्य जाँच
स्मृति-संकेत
लोक लेखा समिति
लोक लेखों और लेखा-परीक्षा निष्कर्षों की जाँच, जिसमें उसे भेजे गए नियंत्रक-महालेखापरीक्षक प्रतिवेदन शामिल हैं।
क्या पैसा कानून और स्वीकृति के अनुसार खर्च हुआ?
प्राक्कलन समिति
प्राक्कलन, मितव्ययिता, दक्षता और प्रशासनिक सुधार की संभावना की जाँच।
प्रस्तावित खर्च अधिक अच्छा कैसे हो सकता है?
सरकारी उपक्रम समिति
अपने कार्यक्षेत्र में राज्य के सरकारी उपक्रमों और संबंधित लेखा-परीक्षा सामग्री की जाँच।
सार्वजनिक उद्यम का प्रदर्शन और शासन कैसा है?
20. बिहार सरकार के भीतर कानून-निर्माण में सहायता
संस्था
भूमिका
प्रशासनिक विभाग
नीति की आवश्यकता पहचानता और विषयगत प्रस्ताव तैयार करता है।
विधि विभाग
विधेयक पर सलाह, विधेयक और अध्यादेश का प्रारूपण तथा नियम, विनियम, अधिसूचना आदि का विधिक परीक्षण।
संसदीय कार्य विभाग
सरकार के विधायी कार्यक्रम और दोनों सदनों के कार्य का समन्वय।
मंत्रिमंडल
कार्य-संचालन नियमों के अधीन सरकारी विधायी नीति को सामूहिक राजनीतिक स्वीकृति।
विधानमंडल
बहस, अनुमत सीमा में संशोधन और प्रस्ताव को पारित अथवा अस्वीकार करता है।
राज्यपाल/राष्ट्रपति
अनुच्छेद 200–201 के अनुसार लागू अनुमति या आरक्षण की संवैधानिक भूमिका।