BPSC बिहार के गठन का वर्ष, विधान परिषद की पहली बैठक, प्रांतीय स्वायत्तता और द्विसदनीय व्यवस्था से जुड़ा अधिनियम, आज के राज्य विधानमंडल से जुड़े अनुच्छेद अथवा 1956 और 2000 के क्षेत्रीय परिवर्तनों के परिणाम पूछ सकता है। सही तैयारी का सूत्र है—तिथि + वैधानिक आधार + संस्थागत परिणाम।
क्रम इस प्रकार याद रखें: बंगाल प्रेसिडेंसी → बिहार एवं उड़ीसा प्रांत → गवर्नर का प्रांत → द्विसदनीय विधानमंडल वाला पृथक बिहार प्रांत → संविधान के अधीन बिहार राज्य → सीमा-समायोजन → झारखंड का निर्माण।
2. वे शब्द जिन्हें आपस में नहीं मिलाना चाहिए
शब्द
इस अध्याय में अर्थ
परीक्षा-सावधानी
प्रेसिडेंसी
औपनिवेशिक शासन की बड़ी प्रशासनिक इकाई; बिहार पहले बंगाल प्रेसिडेंसी के भीतर प्रशासित था।
यह भारतीय संविधान के अधीन राज्य नहीं था।
प्रांत
ब्रिटिश भारत की वह भू-प्रशासनिक इकाई जो साम्राज्यीय अधिनियमों और आदेशों से संचालित होती थी।
1912 में बने प्रांत में बिहार और उड़ीसा दोनों थे।
गवर्नर का प्रांत
उस समय के संवैधानिक सुधारों के अंतर्गत गवर्नर के अधीन रखा गया प्रांत।
बिहार एवं उड़ीसा को 29 दिसंबर 1920 को यह दर्जा मिला।
प्रांतीय स्वायत्तता
भारत शासन अधिनियम, 1935 ने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर उत्तरदायी प्रांतीय शासन का क्षेत्र बढ़ाया।
यह अभी भी औपनिवेशिक शासन था, पूर्ण संप्रभुता नहीं।
संघ का राज्य
भारतीय संविधान के अधीन संघ की घटक इकाई।
26 जनवरी 1950 को बिहार भाग ‘क’ का राज्य बना; यह श्रेणीकरण 1956 में समाप्त हुआ।
पुनर्गठन
संसदीय कानून द्वारा क्षेत्र, सीमा या प्रतिनिधित्व में परिवर्तन।
1956 में बिहार–पश्चिम बंगाल सीमा बदली; 2000 में झारखंड बना।
3. परीक्षा-उपयोगी कालक्रम
तिथि
घटना
महत्त्व
25 अगस्त 1911
भारत सरकार ने बिहार एवं उड़ीसा के लिए पृथक उपराज्यपाल-प्रांत, विधान परिषद और राजधानी पटना की अनुशंसा की।
औपचारिक गठन से पहले की प्रशासनिक योजना।
12 दिसंबर 1911
दिल्ली दरबार की घोषणा ने प्रांतीय पुनर्व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से बताया।
घोषणा को वैधानिक गठन न समझें।
22 मार्च 1912
बंगाल से अलग बिहार एवं उड़ीसा प्रांत बना।
बिहार दिवस इसी घटना की स्मृति है।
20 जनवरी 1913
नई प्रांतीय विधान परिषद की पहली बैठक बाँकीपुर में हुई।
बिहार की संस्थागत विधायी यात्रा का आरंभ।
29 दिसंबर 1920
बिहार एवं उड़ीसा गवर्नर का प्रांत बना।
पुनर्गठित परिषद की पृष्ठभूमि।
7 फरवरी 1921
पुनर्गठित प्रांतीय विधान परिषद की पहली बैठक हुई।
भारत शासन अधिनियम, 1919 के सुधारों से जुड़ा चरण।
22 नवंबर 1921
परिषद ने प्रांत में महिलाओं को मताधिकार देने वाला प्रस्ताव/विधेयक पारित किया।
बिहार का महत्त्वपूर्ण विधायी पड़ाव।
1 अप्रैल 1936
उड़ीसा पृथक प्रांत बना; बिहार अलग प्रांत के रूप में रहा।
1912 का संयुक्त प्रांत समाप्त हुआ।
22 जुलाई 1936
नई व्यवस्था में पृथक बिहार विधान परिषद की पहली बैठक हुई।
द्विसदनीय संस्थागत परिवर्तन।
20 जुलाई 1937
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पहला उत्तरदायी मंत्रिमंडल विधिवत गठित हुआ।
प्रांतीय चुनाव और स्वायत्तता का परिणाम।
22 जुलाई 1937
विधानमंडल के दोनों सदनों का पहला संयुक्त अधिवेशन हुआ।
द्विसदनीय विधानमंडल का व्यावहारिक संचालन।
26 जनवरी 1950
संविधान लागू हुआ; बिहार भाग ‘क’ का राज्य बना।
औपनिवेशिक प्रांत का संवैधानिक राज्य में रूपांतरण।
1 नवंबर 1956
बिहार–पश्चिम बंगाल क्षेत्रीय हस्तांतरण प्रभावी हुआ।
सीमा और प्रतिनिधित्व में समायोजन।
15 नवंबर 2000
बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के अंतर्गत झारखंड बना।
बड़ा क्षेत्रीय और विधायी पुनर्गठन।
4. बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग क्यों किया गया?
1912 से पहले बिहार का प्रशासन बंगाल प्रेसिडेंसी के भीतर होता था। प्रशासनिक विस्तार, क्षेत्रीय पहचान, भाषा और अलग प्रांतीय व्यवस्था की माँग ने परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार की। 25 अगस्त 1911 की भारत सरकार की अनुशंसा में उपराज्यपाल के अधीन पृथक प्रांत, अपनी विधान परिषद और पटना को राजधानी बनाने की बात थी। 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में घोषणा हुई और 22 मार्च 1912 को प्रांत का औपचारिक गठन हुआ।
परीक्षा में अंतर: 12 दिसंबर 1911 घोषणा की तिथि है; 22 मार्च 1912 बिहार एवं उड़ीसा प्रांत के गठन की तिथि है। बिहार दिवस दूसरी तिथि पर मनाया जाता है।
5. पहली प्रांतीय विधान परिषद, 1913
पक्ष
सत्यापित तथ्य
वैधानिक पृष्ठभूमि
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 तथा 1909 की व्यवस्था को नए प्रांत के अनुरूप लागू किया गया।
कुल सदस्य
43: 3 पदेन, 21 निर्वाचित और 19 मनोनीत सदस्य।
पहली बैठक
20 जनवरी 1913।
स्थान
बाँकीपुर स्थित पटना कॉलेज का सभागार।
स्वरूप
सीमित औपनिवेशिक प्रतिनिधि संस्था; मताधिकार और मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व आधुनिक लोकतांत्रिक अर्थ में नहीं थे।
6. 1919 के सुधार और द्वैध शासन
तत्त्व
अर्थ
बिहार से संबंध
भारत शासन अधिनियम, 1919
प्रांतीय विधानमंडलों का विस्तार और प्रांतों में द्वैध शासन की शुरुआत।
पुनर्गठित बिहार एवं उड़ीसा परिषद की पहली बैठक 7 फरवरी 1921 को हुई।
आरक्षित विषय
गवर्नर और उसकी कार्यकारिणी द्वारा संचालित; प्रभावी मंत्री-उत्तरदायित्व से बाहर।
सामान्यतः कानून-व्यवस्था, वित्त और प्रमुख प्रशासन।
हस्तांतरित विषय
औपनिवेशिक सीमाओं में प्रांतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों द्वारा संचालित।
सामान्यतः शिक्षा, लोक-स्वास्थ्य और स्थानीय शासन जैसे क्षेत्र।
सीमा
गवर्नर के पास अधिभावी शक्ति बनी रही; यह आधुनिक अर्थ में उत्तरदायी शासन नहीं था।
1921 को पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता न लिखें।
8. भारत शासन अधिनियम, 1935: निर्णायक प्रांतीय परिवर्तन
परिवर्तन
बिहार पर प्रभाव
प्रांतीय स्वायत्तता
प्रांतीय विषयों का द्वैध शासन समाप्त हुआ और गवर्नर की विशेष शक्तियों के अधीन उत्तरदायी मंत्रिमंडल का क्षेत्र बढ़ा।
क्षेत्रीय पुनर्व्यवस्था
वैधानिक ढाँचे के अंतर्गत उड़ीसा 1 अप्रैल 1936 को पृथक प्रांत बना।
द्विसदनीय विधानमंडल
बिहार को विधान सभा और विधान परिषद मिलीं।
विधान सभा का आकार
1937 की व्यवस्था में पृथक बिहार विधान सभा के 152 सदस्य थे।
चुनाव और मंत्रिमंडल
जनवरी 1937 में चुनाव हुए; डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पहला उत्तरदायी मंत्रिमंडल 20 जुलाई 1937 को विधिवत बना।
9. 1936 और 1937 को एक न समझें
1936
1937
1 अप्रैल को उड़ीसा पृथक प्रांत बना।
प्रांतीय चुनाव से नई विधान सभा और मंत्रिमंडल अस्तित्व में आए।
22 जुलाई को पृथक बिहार विधान परिषद की पहली बैठक हुई।
20 जुलाई को डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का मंत्रिमंडल गठित हुआ।
द्विसदनीय संस्थागत ढाँचा तैयार हुआ।
22 जुलाई को दोनों सदनों का पहला संयुक्त अधिवेशन हुआ।
10. उत्तरदायी शासन, अवरोध और पुनर्स्थापना
जनवरी 1937 के चुनावों के बाद 20 जुलाई 1937 को डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में मंत्रिमंडल गठित हुआ। दोनों सदनों का पहला संयुक्त अधिवेशन 22 जुलाई को हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने पर ब्रिटेन ने निर्वाचित प्रांतीय सरकारों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में सम्मिलित किया; इसके विरोध में अक्टूबर 1939 में मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दिया। प्रांतीय प्रतिनिधि शासन में अवरोध आया। 1946 के चुनावों के बाद श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में फिर सरकार बनी और स्वतंत्रता तथा संविधान की ओर राजनीतिक सेतु तैयार हुआ।
11. प्रांत से संवैधानिक राज्य: 26 जनवरी 1950 को क्या बदला?
संविधान से पहले
संविधान लागू होने के बाद
अंतिम सत्ता ब्रिटिश साम्राज्यीय कानूनों से आती थी।
सत्ता का स्रोत भारतीय संविधान और लोक-प्रभुता बने।
औपनिवेशिक चरणों में सीमित, पात्रता-आधारित और पृथक प्रतिनिधित्व वाली मत-व्यवस्था थी।
संवैधानिक निर्वाचन कानून के अधीन सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रतिनिधि शासन का आधार बना।
गवर्नर के पास औपनिवेशिक आरक्षित शक्तियाँ थीं।
गवर्नर संसदीय व्यवस्था और संवैधानिक सीमाओं के भीतर संवैधानिक प्रमुख है।
बिहार एक प्रांत था।
बिहार भाग ‘क’ का राज्य बना; भाग क/ख/ग का वर्गीकरण 1956 में समाप्त हुआ।
विधायी संस्थाएँ औपनिवेशिक कानून पर आधारित थीं।
राज्य विधानमंडल का मुख्य आधार संविधान का भाग VI है।
12. संवैधानिक निरंतरता: पुरानी व्यवस्था एकाएक शून्य नहीं हुई
अनुच्छेद
निरंतरता का नियम
अनुच्छेद 372
संविधान के अधीन रहते हुए पूर्ववर्ती कानून तब तक लागू रहे, जब तक सक्षम विधानमंडल या प्राधिकारी ने उन्हें बदला, निरस्त या संशोधित न किया।
अनुच्छेद 375
न्यायालय, नागरिक प्राधिकारी और अधिकारी संविधान के अधीन अपना कार्य करते रहे।
अनुच्छेद 376
विद्यमान उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की संक्रमणकालीन निरंतरता की व्यवस्था की।
13. संविधान के अधीन बिहार का द्विसदनीय विधानमंडल
अनुच्छेद
नियम
168
राज्य विधानमंडलों का प्रावधान। बिहार में राज्यपाल और दो सदन—विधान सभा तथा विधान परिषद—हैं।
169
विधान सभा द्वारा निर्धारित विशेष संकल्प पारित होने के बाद संसद राज्य विधान परिषद का सृजन या उन्मूलन कर सकती है।
170
विधान सभाओं की संरचना से संबंधित।
171
विधान परिषद की संरचना तथा उसके निर्वाचित और मनोनीत वर्गों से संबंधित।
172
विधान सभा की सामान्य अवधि पाँच वर्ष है, यदि पहले भंग न हो; परिषद भंग नहीं होती और लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष निवृत्त होते हैं।
174
राज्यपाल सदनों को बुलाता और सत्रावसित करता है तथा विधान सभा को भंग कर सकता है; निर्दिष्ट दो बैठकों के बीच छह महीने से अधिक अंतर नहीं हो सकता।
15. विधान सभा और विधान परिषद: संस्थागत समझ
पक्ष
विधान सभा
विधान परिषद
स्वरूप
क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुना गया लोकप्रिय सदन।
अनुच्छेद 171 के अंतर्गत विभिन्न निर्वाचन-वर्गों और मनोनीत सदस्यों वाला स्थायी सदन।
भंग होना
भंग हो सकती है; सामान्य अवधि पाँच वर्ष।
भंग नहीं होती; क्रमिक निवृत्ति होती है।
सरकार का उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
विश्वास मत से सरकार बना या गिरा नहीं सकती।
धन विधेयक
निर्णायक सदन; धन विधेयक यहीं प्रस्तुत होता है।
संवैधानिक समय के भीतर सिफारिश कर सकती है, पर रोक नहीं सकती।
बिहार में महत्त्व
2000 के पुनर्गठन के बाद निर्वाचित सदस्य-संख्या 243 हुई।
आधिकारिक परिषद इतिहास के अनुसार संख्या 96 से घटकर 75 हुई।
17. 1956 का बिहार–पश्चिम बंगाल क्षेत्रीय हस्तांतरण
पक्ष
सत्यापित स्थिति
कानून
बिहार तथा पश्चिम बंगाल (राज्यक्षेत्र अंतरण) अधिनियम, 1956।
अधिनियमन
1956 का अधिनियम 40; 1 सितंबर 1956 को अधिनियमित।
नियत दिन
1 नवंबर 1956।
किशनगंज/पूर्णिया क्षेत्र
कानून द्वारा सीमांकित पूर्णिया जिले के किशनगंज अनुमंडल का निर्दिष्ट भाग और गोपालपुर थाना से जुड़ा निर्दिष्ट भाग पश्चिम बंगाल को गया।
मानभूम क्षेत्र
पुरुलिया अनुमंडल हस्तांतरित हुआ, पर चास थाना, चांडिल थाना और बड़ाभूम थाना का पटमदा पुलिस थाना क्षेत्र इससे बाहर रहे।
18. बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000
पक्ष
सत्यापित स्थिति
कानून
बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 (2000 का अधिनियम 30)।
अधिनियमन
25 अगस्त 2000।
नियत दिन
15 नवंबर 2000।
क्षेत्रीय परिणाम
निर्दिष्ट दक्षिणी क्षेत्र नए झारखंड राज्य में गए।
बिहार परिषद का आधिकारिक विवरण
चार प्रमंडलों के 18 जिले अलग हुए।
बिहार विधान सभा
नए राज्य को दी गई सीटों के अलग होने के बाद निर्वाचित सदस्य-संख्या 243 हुई।
बिहार विधान परिषद
सदस्य-संख्या 96 से घटकर 75 हुई।
19. 1912, 1936, 1950 और 2000 की तुलना
वर्ष
परिवर्तन का प्रकार
सही वर्णन
1912
औपनिवेशिक प्रांत का निर्माण
बिहार एवं उड़ीसा प्रांत बंगाल से अलग बना।
1936
औपनिवेशिक प्रांतीय विभाजन
उड़ीसा पृथक प्रांत बना; बिहार अलग प्रांत के रूप में रहा।