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प्रमुख संविधान संशोधन और ऐतिहासिक संवैधानिक निर्णय

145 min read · Updated 5 Oct 2026

1. बीपीएससी की माँग: संशोधन–अनुच्छेद–निर्णय को त्रिकोण की तरह पढ़ें

प्रारंभिक परीक्षा में संशोधन संख्या और प्रावधान का सुमेलन, घटनाक्रम, विपरीत प्रभाव वाले दो संशोधन अथवा निर्णय और उसके निष्कर्ष का मेल पूछा जाता है। हमेशा पूछें—क्या बदला? संविधान में कहाँ बदला? क्या बाद के संशोधन या निर्णय ने उसे सीमित किया? उदाहरणतः 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 31C को सभी नीति-निदेशक तत्वों तक बढ़ाया, किंतु मिनर्वा मिल्स ने इस विस्तार को अमान्य कर दिया।

मुख्य परीक्षा में क्रम रखें—संवैधानिक समस्या → संशोधन या निर्णय → नियंत्रक सिद्धांत → संस्थागत परिणाम। बिहार का संबंध राज्य अनुसमर्थन, आरक्षण, अनुच्छेद 356, स्थानीय शासन और संघीय वित्त से बनता है।

2. संशोधन की प्रक्रिया: मूल नियम

मार्गनियमउदाहरण
अनुच्छेद 368 से बाहर साधारण बहुमतसामान्य विधायी बहुमत; संविधान स्वयं कुछ परिवर्तनों को अनुच्छेद 368 का संशोधन नहीं मानता।अनुच्छेद 2–4 के अंतर्गत राज्य परिवर्तन; अनुच्छेद 169 के अंतर्गत राज्य विधान परिषद।
अनुच्छेद 368 का विशेष बहुमतप्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वालों का कम-से-कम दो-तिहाई। संयुक्त बैठक नहीं; राष्ट्रपति स्वीकृति देंगे।अधिकांश प्रावधान, पर मूल संरचना की सीमा लागू।
विशेष बहुमत और राज्य अनुसमर्थनउसी संसदीय बहुमत के बाद, राष्ट्रपति की स्वीकृति से पहले कम-से-कम आधे राज्य विधानमंडलों का अनुसमर्थन।राष्ट्रपति चुनाव, निर्दिष्ट कार्यपालिका/न्यायालय प्रावधान, सातवीं अनुसूची की सूचियाँ, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व और अनुच्छेद 368।

3. अत्यंत महत्त्वपूर्ण संशोधन: 1951–1978

संशोधनमुख्य परिवर्तनसावधानी
पहला, 1951अनुच्छेद 15(4), 31A–31B और नौवीं अनुसूची जोड़ी; अनुच्छेद 19 के प्रतिबंध बदले।आई.आर. कोएलो के बाद नौवीं अनुसूची पूर्णतः न्यायिक जाँच से मुक्त नहीं।
सातवाँ, 1956राज्यों के पुनर्गठन के बाद पहली अनुसूची और संवैधानिक व्यवस्था बदली; भाग A/B/C के स्थान पर राज्य और संघ राज्य-क्षेत्र की व्यवस्था आई।यह राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 से अलग संविधान संशोधन है।
24वाँ, 1971हर प्रावधान में संशोधन की संविधान-निर्मात्री शक्ति स्पष्ट की; अनुच्छेद 13 और 368 बदले; राष्ट्रपति की स्वीकृति अनिवार्य की।गोलकनाथ की प्रतिक्रिया; फिर भी केशवानंद की मूल संरचना सीमा लागू।
25वाँ, 1971अनुच्छेद 39(b)–(c) लागू करने वाले कानूनों के लिए अनुच्छेद 31C जोड़ा और तत्कालीन संपत्ति-प्रतिपूर्ति ढाँचा बदला।केशवानंद ने 39(b)–(c) से संबंध की न्यायिक जाँच रोकने वाला भाग अमान्य किया।
26वाँ, 1971पूर्व शासकों की मान्यता और प्रिवी पर्स समाप्त; अनुच्छेद 363A जोड़ा।26 = प्रिवी पर्स।
36वाँ, 1975सिक्किम पूर्ण राज्य बना और अनुच्छेद 371F जोड़ा गया।35वें संशोधन ने पहले सह-राज्य की व्यवस्था बनाई थी।
42वाँ, 1976उद्देशिका में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता; मूल कर्तव्य; नीति-निदेशक तत्व, अधिकरण और संघीय प्रभाव का विस्तार; 31C तथा संशोधन शक्ति बढ़ाने का प्रयास।इसके सभी प्रावधान जीवित नहीं रहे।
43वाँ, 197742वें की कई रोक हटाईं, अनुच्छेद 31D समाप्त और महत्त्वपूर्ण न्यायिक अधिकारिता पुनर्स्थापित की।सुधार 44वें से पहले ही आरंभ हुआ।
44वाँ, 1978आंतरिक अशांति के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह; आपात सुरक्षा मजबूत; अनुच्छेद 20–21 की रक्षा; पाँच वर्षीय अवधि बहाल; संपत्ति को अनुच्छेद 300A में रखा।संपत्ति अब संवैधानिक अधिकार है, मूल अधिकार नहीं।

4. लोकतंत्र, स्थानीय शासन और आरक्षण के संशोधन

संशोधनमुख्य तथ्ययाद रखने का आधार
52वाँ, 1985दल-बदल विरोधी व्यवस्था।दसवीं अनुसूची; किहोटो के अनुसार पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन योग्य।
61वाँ, 1988मतदान आयु 21 से 18 वर्ष।अनुच्छेद 326।
69वाँ, 1991विधानसभा और मंत्रिपरिषद सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की व्यवस्था।अनुच्छेद 239AA–239AB; सामान्य पूर्ण राज्य नहीं।
73वाँ, 1992पंचायत, ग्राम सभा, आरक्षण, पाँच वर्षीय अवधि, राज्य निर्वाचन और वित्त आयोग।भाग IX, ग्यारहवीं अनुसूची; 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी।
74वाँ, 1992नगरपालिकाएँ, वार्ड समिति और जिला/महानगर योजना।भाग IXA, बारहवीं अनुसूची; 1 जून 1993 से प्रभावी।
77वाँ, 1995संवैधानिक शर्तों के अधीन SC/ST के लिए पदोन्नति आरक्षण सक्षम।अनुच्छेद 16(4A)।
81वाँ, 2000भरी जाने वाली पिछली आरक्षित रिक्तियों को उस वर्ष की सीमा-गणना में अलग वर्ग माना जा सकता है।अनुच्छेद 16(4B)।
82वाँ, 2000SC/ST पदोन्नति में अर्हक अंक या मूल्यांकन मानक में छूट सक्षम।अनुच्छेद 335 का परंतुक।
85वाँ, 2001अनुच्छेद 16(4A) में परिणामी वरिष्ठता, घोषित भूतलक्षी प्रभाव सहित।सक्षमकारी प्रावधान; स्वतः लागू सार्वभौम आदेश नहीं।
86वाँ, 20026–14 वर्ष की शिक्षा का अधिकार; प्रारंभिक बाल्य देखभाल वाला अनुच्छेद 45; अभिभावक का कर्तव्य।अनुच्छेद 21A, 45, 51A(k)।
91वाँ, 2003मंत्रिपरिषद की सीमा सदन के 15%; राज्य में न्यूनतम 12; एक-तिहाई विभाजन बचाव हटाया।अनुच्छेद 75(1A), 164(1A), 361B और दसवीं अनुसूची।
93वाँ, 2005निजी संस्थानों सहित शिक्षण संस्थानों में SEBC/SC/ST प्रवेश के विशेष प्रावधान सक्षम, पर अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यक संस्थान बाहर।अनुच्छेद 15(5)।

5. महत्त्वपूर्ण संशोधन: 97वाँ–106वाँ

संशोधनमुख्य प्रभाववर्तमान संवैधानिक स्थिति
97वाँ, 2011सहकारी समितियाँ अनुच्छेद 19(1)(c) में; अनुच्छेद 43B और भाग IXB।राजेंद्र एन. शाह (2021) ने अनुसमर्थन के अभाव में राज्य-भीतर सहकारी समितियों पर भाग IXB अमान्य किया; बहुराज्यीय भाग तथा 19(1)(c), 43B बचे रहे।
99वाँ, 2014राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का प्रयास।2015 में संशोधन और NJAC अधिनियम न्यायिक स्वतंत्रता/मूल संरचना के विरुद्ध अमान्य।
100वाँ, 2015पहली अनुसूची बदलकर भारत–बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते को लागू किया।बेरुबारी और भू-भाग विनिमय के संवैधानिक अधिकार से जोड़ें।
101वाँ, 2016वस्तु एवं सेवा कर का संवैधानिक ढाँचा।अनुच्छेद 246A, 269A, 279A; GST परिषद संवैधानिक निकाय।
102वाँ, 2018राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा और केंद्रीय सूची ढाँचा।अनुच्छेद 338B, 342A, 366(26C); राज्य शक्ति का समाधान 105वें में।
103वाँ, 2019अनुच्छेद 15(4)/(5) के वर्गों से बाहर EWS हेतु अधिकतम 10% अतिरिक्त आरक्षण सक्षम।अनुच्छेद 15(6), 16(6); जनहित अभियान (2022) में 3:2 से वैध।
104वाँ, 2019लोकसभा/विधानसभाओं में SC/ST आरक्षित सीटें दस वर्ष बढ़ीं; आंग्ल-भारतीय नामांकन नहीं बढ़ा।अनुच्छेद 334 की अवधि 2030 तक।
105वाँ, 2021राज्यों और संघ राज्य-क्षेत्रों की अपने प्रयोजन के लिए अलग SEBC सूची की शक्ति पुनःस्थापित/स्पष्ट।मराठा आरक्षण व्याख्या के बाद अनुच्छेद 338B, 342A, 366 बदले।
106वाँ, 2023लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण, SC/ST सीटों के भीतर भी एक-तिहाई।अनुच्छेद 330A, 332A, 334A और 239AA में बदलाव। पाठ क्रियान्वयन को प्रारंभ, बाद की जनगणना और परिसीमन से जोड़ता है; स्वीकृति मात्र से वर्तमान सीटें तत्काल आरक्षित नहीं होतीं।

6. 42वाँ और 44वाँ संशोधन

क्षेत्र42वाँ44वाँ या बाद की स्थिति
उद्देशिकासमाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता जोड़े।ये शब्द बने रहे; 44वें ने नहीं हटाया।
विधायिका अवधिसामान्य अवधि छह वर्ष।पाँच वर्ष बहाल।
आपातकालसंघ का आपात प्रभुत्व बढ़ा।सशस्त्र विद्रोह, मंत्रिमंडल की लिखित सलाह और कठोर स्वीकृति/नवीकरण सुरक्षा।
आपातकाल में अधिकारप्रभुत्व विस्तृत।अनुच्छेद 359 के आदेश से 20–21 निलंबित नहीं; अनुच्छेद 358 केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण वाले आपात तक।
संपत्तिइसे भाग III से नहीं हटाया।19(1)(f), 31 हटे; 300A जुड़ा।
अनुच्छेद 31Cसभी नीति-निदेशक तत्वों के कानूनों तक सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास।मिनर्वा मिल्स ने विस्तार हटाया; सुरक्षा 39(b)–(c) तक।
संशोधन शक्तिन्यायिक पुनरावलोकन और सीमा हटाने को 368(4)–(5) जोड़े।मिनर्वा मिल्स ने, केवल 44वें ने नहीं, इन्हें अमान्य किया।

7. 73वाँ और 74वाँ संशोधन

विशेषता73वाँ74वाँ
क्षेत्रग्रामीण पंचायतनगरीय नगरपालिका
भाग/अनुसूचीभाग IX; ग्यारहवीं अनुसूची, 29 विषयभाग IXA; बारहवीं अनुसूची, 18 विषय
आधार मंचग्राम सभानिर्दिष्ट बड़ी नगरपालिकाओं में वार्ड समिति; समान संवैधानिक नगरीय ग्राम सभा नहीं
योजनाजिला योजना समिति से संबंधजहाँ लागू, जिला और महानगर योजना समितियाँ
चुनावराज्य निर्वाचन आयोग, भारत निर्वाचन आयोग नहीं
वित्तराज्य वित्त आयोग; अनुच्छेद 243Y नगरपालिका संबंधी भूमिका लागू करता है

8. संशोधन शक्ति और मूल संरचना: न्यायिक शृंखला

निर्णययाद रखने योग्य निष्कर्षभ्रम से बचें
शंकरी प्रसाद (1951)इस प्रयोजन के लिए अनुच्छेद 368 का संशोधन अनुच्छेद 13 का कानून नहीं; संसद अधिकारों में संशोधन कर सकती थी।इसने मूल संरचना सिद्धांत नहीं बनाया।
सज्जन सिंह (1965)पहली स्थिति दोहराई; अलग मतों की शंकाओं ने बाद की बहस की भूमिका बनाई।इसे गोलकनाथ का नियम न मानें।
गोलकनाथ (1967)बहुमत ने संशोधन को अनुच्छेद 13 का कानून मानकर मूल अधिकार घटाने पर भावी रोक लगाई।24वें और केशवानंद ने इसे अलग नियम से विस्थापित किया।
केशवानंद भारती (1973)हर भाग संशोधित हो सकता है, पर मूल संरचना नष्ट या क्षतिग्रस्त नहीं हो सकती।बंद सूची या हर संशोधन पर रोक नहीं।
इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975)निर्दिष्ट उच्च पदों के चुनाव को मिली संशोधनजन्य प्रतिरक्षा अमान्य; स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव, विधि शासन और पुनरावलोकन मूल संरचना से जुड़े।यह अनुच्छेद 356 वाला निर्णय नहीं।
मिनर्वा मिल्स (1980)सीमित संशोधन शक्ति और पुनरावलोकन मूल विशेषताएँ; 368(4)–(5) और 31C का व्यापक विस्तार अमान्य।सभी नीति-निदेशक तत्व अमान्य नहीं; भाग III–IV सामंजस्य पर बल।
वामन राव (1981)बाद की नौवीं अनुसूची प्रविष्टियों की जाँच हेतु 24 अप्रैल 1973 को निर्णायक सीमा माना।हर अनुसूचित कानून को स्थायी प्रतिरक्षा नहीं।
आई.आर. कोएलो (2007)24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में रखे कानून जाँचे जा सकते हैं, यदि प्रभाव मूल संरचना वाले अधिकारों को क्षति पहुँचाता हो।नौवीं अनुसूची पूर्ण कवच नहीं।

9. मूल अधिकारों का न्यायिक विकास

निर्णयसिद्धांतपरीक्षा संबंध
चंपकम दोरैराजन (1951)तत्कालीन पाठ में टकराव होने पर प्रवर्तनीय मूल अधिकार नीति-निदेशक तत्व पर प्रभावी।पहले संशोधन के अनुच्छेद 15(4) की पृष्ठभूमि।
आर.सी. कूपर (1970)राज्य कार्रवाई के प्रभाव को देखा और अधिकारों को बंद खानों में बाँटने की धारणा कमजोर की।ए.के. गोपालन से मेनका तक सेतु।
मेनका गांधी (1978)अनुच्छेद 21 की प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त; लागू स्थिति में 14, 19 और 21 परस्पर संबद्ध।विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया मनमानी नहीं हो सकती।
विशाखा (1997)विधायी रिक्तता में मूल अधिकारों और प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कार्यस्थल यौन उत्पीड़न सुरक्षा।2013 के कानून तक दिशा-निर्देश लागू रहे।
के.एस. पुट्टस्वामी (2017)नौ न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से निजता को स्वतंत्रता/गरिमा और भाग III में निहित मूल अधिकार माना।निजता निरपेक्ष नहीं; प्रतिबंध को संवैधानिक औचित्य चाहिए।
नवतेज सिंह जौहर (2018)वयस्कों के सहमति-आधारित समलैंगिक संबंध अपराध बनाने की सीमा तक धारा 377 को सीमित पढ़ा; गरिमा, समानता, निजता और संवैधानिक नैतिकता की पुष्टि।तत्कालीन धारा 377 के हर प्रयोग को समाप्त नहीं किया था।

10. संघवाद, लोकतंत्र और संस्थाएँ

निर्णयनिष्कर्षबीपीएससी संबंध
बेरुबारी संघ (1960 परामर्श मत)भारतीय भू-भाग के हस्तांतरण हेतु संविधान संशोधन; उस समय उद्देशिका को संविधान का भाग नहीं माना।केशवानंद ने बाद में उद्देशिका को भाग माना, पर स्वतंत्र शक्ति-स्रोत नहीं।
किहोटो होलोहन (1992)दसवीं अनुसूची मूलतः वैध; पीठासीन अधिकारी अधिकरण की तरह और अंतिम निर्णय पुनरावलोकन योग्य।अध्यक्ष को पूर्ण न्यायिक प्रतिरक्षा नहीं।
एस.आर. बोम्मई (1994)अनुच्छेद 356 उद्घोषणा पुनरावलोकन योग्य; बहुमत सामान्यतः सदन-पटल पर; पंथनिरपेक्षता मूल विशेषता।राज्यपाल, संघवाद, राष्ट्रपति शासन।
एल. चंद्र कुमार (1997)उच्च न्यायालय का 226/227 और सर्वोच्च न्यायालय का 32 पुनरावलोकन मूल संरचना; अधिकरण निर्णय उच्च न्यायालय के अधीन।अधिकरण पूरक हैं, उच्च न्यायालय के संवैधानिक स्थानापन्न नहीं।
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (2015)99वाँ संशोधन और NJAC अधिनियम अमान्य; न्यायिक स्वतंत्रता मूल संरचना का केंद्र।NJAC पारित इतिहास है, चालू व्यवस्था नहीं।
राजेंद्र एन. शाह (2021)राज्य-भीतर सहकारी क्षेत्र में भाग IXB आवश्यक राज्य अनुसमर्थन के बिना विफल; बहुराज्यीय भाग बचा।अनुसमर्थन संघीय सुरक्षा है, केवल औपचारिकता नहीं।

11. समानता और आरक्षण की शृंखला

विषयनियंत्रक स्थितिसावधानी
OBC आरक्षणइंद्रा साहनी (1992) ने केंद्र का 27% OBC आरक्षण वैध, क्रीमी लेयर बहिष्कार आवश्यक, 50% को सामान्य सीमा और तत्कालीन 16(4) में पदोन्नति आरक्षण अस्वीकार किया।बाद में 16(4A)/(4B) आए, फिर भी न्यायिक सिद्धांत लागू।
पदोन्नति77वाँ, 81वाँ, 82वाँ, 85वाँ—पदोन्नति, पिछली रिक्ति, मानक-छूट और परिणामी वरिष्ठता।सक्षमकारी शक्ति स्वतः अधिकार नहीं।
EWS103वें से 15(6), 16(6); जनहित अभियान ने 3:2 से वैध रखा।अधिकतम 10%; 15(4)/(5) वर्गों से बाहर।
SEBC पहचान102वें से NCBC/केंद्रीय सूची; 105वें से अलग राज्य/संघ राज्य-क्षेत्र सूचियाँ स्पष्ट।105वें ने NCBC नहीं बनाया।
राजनीतिक सीटें104वें से SC/ST आरक्षित सीटें 2030 तक, आंग्ल-भारतीय नामांकन नहीं।शिक्षा/नौकरी आरक्षण से अलग।

13. मूल संरचना: अनुशासित समझ

संविधान में इसकी बंद सूची नहीं। बार-बार मान्य विशेषताओं में संविधान की सर्वोच्चता, गणतांत्रिक-लोकतांत्रिक शासन, पंथनिरपेक्षता, संघवाद, शक्ति-पृथक्करण, विधि शासन, न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव, सीमित संशोधन शक्ति, गरिमा-स्वतंत्रता-समानता और मूल अधिकार–नीति-निदेशक सामंजस्य शामिल हैं।

तीन भेद रखें—महत्त्वपूर्ण प्रावधान का हर विवरण स्वतः मूल संरचना नहीं; साधारण कानून प्रायः संविधान के स्पष्ट प्रावधानों पर जाँचा जाता है; संविधान संशोधन मूल संरचना पर। पृथक्करणीयता लागू हो तो एक भाग की अमान्यता से सब भाग स्वतः नहीं मिटते।

14. बिहार संबंध

20. बीपीएससी-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न