बीपीएससी किसी संस्था पर प्रायः पाँच आधारों से प्रश्न बनाता है: उसे किसने बनाया? नियुक्ति कौन करता है? हटाता कौन है? उसके कार्य क्या हैं? वह प्रतिवेदन किसे देती है? बिहार-विशेष प्रश्नों में स्थापना की तिथि, संबंधित अनुच्छेद या अधिनियम तथा मिलते-जुलते नाम वाली संस्था भी पूछी जा सकती है।
अध्ययन का क्रम रखें—स्रोत → संरचना → कार्यकाल/हटाना → कार्य → उत्तरदायित्व। किसी संस्था का उद्देश्य संवैधानिक हो सकता है, पर इससे वह संस्था अपने-आप संवैधानिक नहीं बन जाती। जैसे, बिहार राज्य महिला आयोग समानता को बढ़ावा देता है, किंतु उसका गठन बिहार के एक अधिनियम से हुआ है, इसलिए वह वैधानिक संस्था है।
2. तीन विधिक श्रेणियाँ
श्रेणी
अस्तित्व का स्रोत
बिहार से जुड़े उदाहरण
परीक्षा में जाँच
संवैधानिक निकाय या पद
संविधान स्वयं उस निकाय या पद की व्यवस्था करता है।
अनुच्छेद 315 के अंतर्गत बीपीएससी; अनुच्छेद 243I के अंतर्गत राज्य वित्त आयोग; अनुच्छेद 243K के अंतर्गत राज्य निर्वाचन आयोग; अनुच्छेद 165 के अंतर्गत महाधिवक्ता।
अनुच्छेद, संवैधानिक सुरक्षा और प्रतिवेदन का मार्ग पहचानें।
वैधानिक निकाय
संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए अधिनियम से गठन होता है।
बिहार लोकायुक्त; बिहार सूचना आयोग; बिहार मानवाधिकार आयोग; बिहार राज्य महिला आयोग; बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग।
मूल अधिनियम और यह केंद्रीय या राज्य अधिनियम है—दोनों पहचानें।
कार्यकारी निकाय
अलग गठनकारी अधिनियम के बिना सरकारी आदेश, संकल्प या योजना से बनता है।
अधिसूचना के अनुसार कोई मिशन, कार्यबल या सलाहकार समिति इस श्रेणी में हो सकती है।
सरकारी नाम या महत्त्वपूर्ण कार्य देखकर संवैधानिक दर्जा न मानें।
3. संस्थागत कालक्रम
तिथि/वर्ष
सत्यापित घटना
1 अप्रैल 1949
उड़ीसा और मध्य प्रदेश के लिए कार्यरत आयोग से अलग होने के बाद बिहार लोक सेवा आयोग अस्तित्व में आया।
26 जनवरी 1950
संविधान ने राज्य लोक सेवा आयोगों को भाग XIV के अंतर्गत संवैधानिक संस्था बनाया।
1 मार्च 1951
बीपीएससी का मुख्यालय राँची से पटना स्थानांतरित हुआ।
1993
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम और बिहार का राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम महत्त्वपूर्ण आयोगों का वैधानिक आधार बने।
1999
बिहार राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1999 ने महिला आयोग का राज्य वैधानिक ढाँचा बनाया।
3 जनवरी 2000 / 25 जून 2008
आयोग के आधिकारिक इतिहास के अनुसार बिहार मानवाधिकार आयोग 2000 में अधिसूचना से स्थापित हुआ और 2008 में औपचारिक रूप से गठित हुआ।
2005
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 15 ने राज्य सूचना आयोगों की व्यवस्था की।
22 दिसंबर 2011
बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 को बिहार अधिनियम संख्या 22, 2011 के रूप में अधिनियमित किया गया।
2024
बिहार ने राज्य महिला आयोग से संबंधित कानून में संशोधन किया; इसलिए वर्तमान व्यवस्था को 2024 के संशोधन के साथ पढ़ना चाहिए।
4. बीपीएससी: संवैधानिक पहचान और बिहार का इतिहास
बिंदु
परीक्षोपयोगी स्थिति
संवैधानिक स्रोत
अनुच्छेद 315 संघ और प्रत्येक राज्य के लिए लोक सेवा आयोग की व्यवस्था करता है; संयुक्त आयोग की व्यवस्था भी संभव है।
बिहार में आरंभ
बीपीएससी 1 अप्रैल 1949 को आरंभ हुआ और संविधान लागू होने पर संवैधानिक संस्था बना।
प्रथम मुख्यालय
राँची; 1 मार्च 1951 को पटना स्थानांतरित हुआ।
प्रथम अध्यक्ष
बीपीएससी के आधिकारिक इतिहास के अनुसार राजंधारी सिन्हा।
प्रथम सचिव
उसी आधिकारिक इतिहास के अनुसार राधा कृष्ण चौधरी।
मूल प्रकृति
स्वतंत्र संवैधानिक भर्ती और सलाहकारी निकाय; यह सरकार की निरंकुश इच्छा पर भर्ती करने वाला विभाग नहीं है।
5. बीपीएससी अनुच्छेद मानचित्र: 315–323
अनुच्छेद
राज्य लोक सेवा आयोग से जुड़ा मुख्य नियम
315
संघ और राज्यों के लोक सेवा आयोग स्थापित करता है तथा संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग की अनुमति देता है।
316
राज्यपाल राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करता है; अर्हता, कार्यकाल, आयु और कार्यकारी अध्यक्ष से संबंधित व्यवस्था देता है।
317
सदस्य को राष्ट्रपति हटाता है; कदाचार के आरोप पर उच्चतम न्यायालय की जाँच होती है। मामला भेजे जाने के बाद राष्ट्रपति के आदेश तक राज्यपाल निलंबित कर सकता है।
318
राज्यपाल सदस्यों की संख्या और सेवा-शर्तों का विनियमन कर सकता है; नियुक्ति के बाद सेवा-शर्तों में अलाभकारी परिवर्तन से संवैधानिक सुरक्षा रहती है।
319
आयोग का कार्यकाल पूरा होने के बाद अन्य सरकारी रोजगार पर रोक और कुछ आयोगीय पदों पर जाने की अनुमति से संबंधित नियम।
320
परीक्षा तथा भर्ती-पद्धति, नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानांतरण और अनुशासनात्मक मामलों सहित सलाहकारी कार्य बताता है।
321
राज्य विधानमंडल आयोग के कार्यों को स्थानीय या अन्य वैधानिक निकायों की सेवाओं तक बढ़ा सकता है।
322
वेतन और पेंशन सहित आयोग का व्यय संबंधित संचित निधि पर भारित होता है।
323
राज्य आयोग वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को देता है; राज्यपाल अस्वीकार की गई सलाह पर स्पष्टीकरण सहित उसे विधानमंडल के समक्ष रखता है।
6. नियुक्ति, कार्यकाल और हटाना: यहीं बनते हैं कठिन प्रश्न
विशेषता
बीपीएससी/राज्य आयोग का नियम
भ्रम से बचें
नियुक्ति
राज्यपाल अध्यक्ष और सदस्यों को नियुक्त करता है।
राज्यपाल द्वारा नियुक्ति का अर्थ राज्यपाल द्वारा हटाया जाना नहीं है।
अनुभव नियम
यथासंभव लगभग आधे सदस्यों ने कम-से-कम दस वर्ष सरकारी पद धारण किया हो।
हर सदस्य का सेवानिवृत्त लोक सेवक होना आवश्यक नहीं है।
कार्यकाल
छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु, जो पहले हो।
संघ लोक सेवा आयोग की 65 वर्ष आयु-सीमा राज्य आयोग पर लागू न करें।
त्यागपत्र
राज्यपाल को संबोधित किया जाता है।
त्यागपत्र और पद से हटाने के प्राधिकारी अलग हैं।
कदाचार पर हटाना
राष्ट्रपति के संदर्भ पर उच्चतम न्यायालय की जाँच और प्रतिवेदन के बाद राष्ट्रपति कार्रवाई करता है।
राज्य विधानमंडल आयोग के सदस्य पर महाभियोग नहीं चलाता।
अन्य आधार
दिवालिया घोषित होने, कार्यकाल में पद के बाहर सवेतन रोजगार करने या मानसिक/शारीरिक दुर्बलता पर राष्ट्रपति हटा सकता है।
इन आधारों के लिए विधानमंडल का मतदान आवश्यक नहीं है।
निलंबन
मामला उच्चतम न्यायालय को भेजे जाने के बाद राष्ट्रपति के अंतिम आदेश तक राज्यपाल निलंबित कर सकता है।
निलंबन अंतिम पदच्युति नहीं है।
7. बीपीएससी क्या करता है और परामर्श का क्या अर्थ है?
अनुच्छेद 320 के अनुसार राज्य लोक सेवा आयोग राज्य सेवाओं के लिए परीक्षाएँ आयोजित करता है। भर्ती की पद्धति, नियुक्ति, पदोन्नति और सेवा-स्थानांतरण के सिद्धांत, अभ्यर्थियों की उपयुक्तता, अनुशासनात्मक मामले, कुछ विधिक व्यय-दावे और सेवा में चोट से संबंधित पेंशन-दावों पर उससे परामर्श किया जाता है। राज्यपाल अन्य विषय भी भेज सकता है और अनुच्छेद 321 के अंतर्गत कानून द्वारा कार्य बढ़ाए जा सकते हैं।
आयोग की सलाह सामान्यतः सलाहकारी होती है; वह न्यायालय के निर्णय की तरह बाध्यकारी नहीं होती। फिर भी सुरक्षित सेवा-शर्तें, संचित निधि पर भारित व्यय और अनुच्छेद 323 की प्रतिवेदन-व्यवस्था उसकी स्वतंत्रता को मजबूत करती है। सरकार द्वारा सलाह न मानने पर वार्षिक प्रतिवेदन के साथ कारण-स्मरणिका रखी जाती है। विनियम यह बता सकते हैं कि किन मामलों में परामर्श आवश्यक नहीं होगा; इससे आयोग का संवैधानिक दर्जा समाप्त नहीं होता।
9. राज्य वित्त आयोग: स्थानीय वित्त की संवैधानिक कड़ी
बिंदु
संवैधानिक स्थिति
अनुच्छेद
पंचायतों के लिए अनुच्छेद 243I; अनुच्छेद 243Y उसी आयोग की समीक्षा को नगरपालिकाओं तक बढ़ाता है।
गठन
राज्यपाल 73वें संशोधन के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर और उसके बाद प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर आयोग गठित करता है।
संरचना
राज्य विधानमंडल कानून द्वारा संरचना, अर्हता और चयन की विधि बताता है; संविधान सभी राज्यों पर एक जैसी सदस्य-संख्या लागू नहीं करता।
कर-वितरण
राज्य द्वारा लगाए गए निर्दिष्ट कर, शुल्क, पथकर और फीस की शुद्ध आय के राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वितरण के सिद्धांत सुझाता है।
सौंपे गए राजस्व
पंचायतों और नगरपालिकाओं को सौंपे या उनके द्वारा विनियोजित किए जाने वाले कर, शुल्क, पथकर और फीस के सिद्धांत सुझाता है।
अनुदान
राज्य की संचित निधि से सहायता-अनुदान के सिद्धांत सुझाता है।
सुधार
स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति सुधारने के उपाय और राज्यपाल द्वारा भेजे गए अन्य विषयों पर अनुशंसा करता है।
प्रतिवेदन
राज्यपाल अनुशंसाओं और की गई कार्रवाई की व्याख्यात्मक स्मरणिका को राज्य विधानमंडल के समक्ष रखता है।
10. “वित्त” नाम वाली तीन संस्थाओं में अंतर
संस्था
स्रोत
मुख्य कार्यक्षेत्र
संघ वित्त आयोग
अनुच्छेद 280
संघ–राज्य वित्तीय संबंध तथा स्थानीय निकायों के लिए राज्यों के संसाधन बढ़ाने के उपाय सहित संवैधानिक अनुशंसाएँ।
बिहार राज्य वित्त आयोग
अनुच्छेद 243I और 243Y तथा बिहार के स्थानीय शासन कानून
राज्य–पंचायत–नगरपालिका संसाधन-वितरण और स्थानीय वित्त को मजबूत करना।
बिहार राज्य वित्तीय निगम
राज्य वित्तीय निगमों से संबंधित कानून के अंतर्गत वैधानिक वित्तीय संस्था
विकास-वित्त/ऋण के कार्य; यह पाँच-वर्षीय स्थानीय निकाय वित्त आयोग नहीं है।
12. बिहार के महाधिवक्ता: राज्य के संवैधानिक विधि अधिकारी
विशेषता
नियम
अनुच्छेद
अनुच्छेद 165; विधानमंडल में भाग लेने के अधिकार अनुच्छेद 177 में हैं।
नियुक्ति
राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की अर्हता रखता हो।
कार्य
राज्य सरकार को विधिक विषयों पर सलाह देना और राज्यपाल द्वारा सौंपे गए अथवा संविधान/कानून से मिले दायित्व निभाना।
कार्यकाल
राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद; पारिश्रमिक राज्यपाल निर्धारित करता है।
विधानमंडल
दोनों सदनों, लागू होने पर संयुक्त बैठक, और जिस समिति में नामित हो उसकी कार्यवाही में बोल और भाग ले सकता है।
मतदान
केवल अनुच्छेद 177 के आधार पर मत देने का अधिकार नहीं है।
दर्जा
संवैधानिक पद; स्थायी लोक सेवा पद या आयोग नहीं।
13. बिहार लोकायुक्त: राज्य की वैधानिक भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था
बिंदु
सत्यापित वैधानिक व्यवस्था
स्रोत
बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 (बिहार अधिनियम 22, 2011), समय-समय पर संशोधित।
दर्जा
राज्य की वैधानिक संस्था; किसी संवैधानिक अनुच्छेद द्वारा सीधे गठित निकाय नहीं।
उद्देश्य
अधिनियम के अंतर्गत आने वाले लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों वाली शिकायतों की जाँच तथा अन्वेषण/अभियोजन का विधिक ढाँचा।
संरचना
एक अध्यक्ष और दो सदस्य; धारा 3 के अनुसार इन तीन में कम-से-कम दो न्यायिक सदस्य होंगे।
अर्हता
अधिनियम सत्यनिष्ठा, प्रतिष्ठा, संबंधित व्यावसायिक अनुभव और आयु की शर्तें देता है; न्यायिक सदस्य के लिए विशेष न्यायिक अर्हता है।
नियुक्ति
वैधानिक चयन समिति की अनुशंसा पर राज्यपाल नियुक्ति करता है; खोज समिति की प्रक्रिया चयन में सहायता करती है।
संस्थागत साधन
जाँच, अन्वेषण-संबंधी व्यवस्था, अनुशंसा, प्रतिवेदन और अन्य शक्तियाँ केवल अधिनियम की सीमा में चलती हैं।
वार्षिक उत्तरदायित्व
अधिनियम राज्य सरकार को वार्षिक प्रतिवेदन और उसे राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष रखे जाने की व्यवस्था करता है।
14. लोकायुक्त न तो न्यायालय है, न थाना, न सतर्कता विभाग
संस्था
मुख्य भूमिका
महत्त्वपूर्ण सीमा
बिहार लोकायुक्त
वैधानिक जाँच/अन्वेषण व्यवस्था से अधिनियम के अंतर्गत आने वाली भ्रष्टाचार शिकायतों की परीक्षा।
केवल बिहार अधिनियम से मिली शक्तियाँ प्रयोग कर सकता है; हर अनुशासनात्मक, आपराधिक या न्यायिक मंच का स्थान नहीं लेता।
पुलिस / अन्वेषण अभिकरण
वैधानिक अधिकार मिलने पर दंड प्रक्रिया और विशेष कानूनों के अंतर्गत अपराध दर्ज कर अन्वेषण।
आपराधिक अन्वेषण और अभियोजन के लिए संबंधित विधिक प्रक्रिया आवश्यक है।
विभागीय प्राधिकारी
सेवा-नियमों के अंतर्गत विभागीय अनुशासन।
विभागीय दायित्व और आपराधिक दायित्व अलग मार्ग हैं।
न्यायालय
अधिकार-क्षेत्र के भीतर वादों का निर्णय और बाध्यकारी न्यायिक आदेश।
लोकायुक्त की अनुशंसा या जाँच-चरण अपने-आप आपराधिक दोषसिद्धि नहीं बनते।
16. बिहार सूचना आयोग: पारदर्शिता संबंधी निर्णय
बिंदु
स्थिति
स्रोत
संसद के सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15।
दर्जा
राज्य का वैधानिक आयोग; संवैधानिक आयोग नहीं।
मुख्य मार्ग
वैधानिक शर्तों के अंतर्गत धारा 18 की शिकायत और धारा 19(3) की द्वितीय अपील।
सूचना-श्रृंखला
आवेदन सामान्यतः लोक सूचना अधिकारी के पास; प्रथम अपील विभागीय प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के पास; द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग में।
शक्तियाँ
अधिनियम जाँच की शक्तियाँ, अनुपालन के निर्देश और धारा 20 के अंतर्गत दंड-संबंधी अधिकार देता है।
सीमा
आयोग उपलब्ध सूचना तक पहुँच और सूचना-अधिकार दायित्व लागू कराता है; वह हर मूल सेवा-लाभ दिलाने वाला सामान्य मंच नहीं है।
17. बिहार मानवाधिकार आयोग
बिंदु
स्थिति
मूल कानून
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993; धारा 21 में राज्य आयोगों की व्यवस्था।
बिहार का इतिहास
आयोग की आधिकारिक भूमिका के अनुसार 3 जनवरी 2000 की अधिसूचना से स्थापना और 25 जून 2008 को औपचारिक गठन।
दर्जा
संसद के कानून के अंतर्गत गठित राज्य वैधानिक आयोग।
कार्य
निर्दिष्ट मानवाधिकार उल्लंघन या लोक सेवक की उपेक्षा की जाँच; सुरक्षा-उपायों की समीक्षा; संस्थाओं का भ्रमण; शोध, साक्षरता और जागरूकता; नागरिक समाज के प्रयासों को प्रोत्साहन।
परिणाम की प्रकृति
वैधानिक अनुशंसाएँ और प्रतिवेदन महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व साधन हैं, किंतु आयोग नियमित आपराधिक न्यायालय नहीं है।
अधिकार-क्षेत्र सावधानी
समय, विषय, सशस्त्र बल और अन्य सीमाएँ वर्तमान अधिनियम से पढ़ें; नैतिक गंभीरता मात्र से अधिकार-क्षेत्र नहीं बनता।
18. बिहार महिला और पिछड़ा वर्ग आयोग
आयोग
विधिक स्रोत
मुख्य क्षेत्र
वर्तमान कानून की सावधानी
बिहार राज्य महिला आयोग
बिहार राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1999 (बिहार अधिनियम 6, 1999), 2024 में संशोधित।
महिलाओं से जुड़े सुरक्षा-उपाय और कानूनों की समीक्षा, शिकायतों और समस्याओं की परीक्षा, अध्ययन और सरकार को सलाह।
संरचना और प्रक्रिया को केवल मूल अधिनियम नहीं, 2024 के संशोधन के साथ पढ़ें।
बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग
राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 (बिहार अधिनियम 12, 1993), जिसमें 2007 का संशोधन भी शामिल है।
राज्य सूची में सम्मिलन तथा अधिक/कम सम्मिलन की शिकायतों, संबंधित अधिकार-वंचना और सरकार से भेजे मामलों की परीक्षा।
इसे अनुच्छेद 338B के राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग या केंद्रीय ओबीसी सूची से न मिलाएँ।
19. एक-पृष्ठ वर्गीकरण सारणी
संस्था
वर्गीकरण
स्रोत-संकेत
प्रतिवेदन / उत्तरदायित्व
बीपीएससी
संवैधानिक निकाय
अनुच्छेद 315–323
राज्यपाल को वार्षिक प्रतिवेदन; कारण-स्मरणिका सहित राज्य विधानमंडल के समक्ष।
बिहार राज्य वित्त आयोग
संवैधानिक आयोग
अनुच्छेद 243I और 243Y
अनुशंसाएँ और कार्रवाई-स्मरणिका विधानमंडल के समक्ष।
बिहार के महाधिवक्ता
संवैधानिक पद
अनुच्छेद 165 और 177
राज्य के विधिक सलाहकार; राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद।
बिहार राज्य निर्वाचन आयोग
संवैधानिक निकाय
अनुच्छेद 243K और 243ZA
स्थानीय चुनावों का स्वतंत्र संवैधानिक नियंत्रण।
बिहार लोकायुक्त
राज्य वैधानिक संस्था
बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011
वैधानिक निष्कर्ष/अनुशंसा और वार्षिक प्रतिवेदन।
बिहार सूचना आयोग
केंद्रीय कानून से बना राज्य वैधानिक आयोग
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15
शिकायत, द्वितीय अपील, अनुपालन और अधिनियम के अंतर्गत दंड।
बिहार मानवाधिकार आयोग
केंद्रीय कानून से बना राज्य वैधानिक आयोग
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 21
जाँच, अनुशंसा और वैधानिक प्रतिवेदन।
बिहार राज्य महिला आयोग
राज्य वैधानिक आयोग
बिहार अधिनियम 6, 1999, संशोधित
समीक्षा, शिकायत, अध्ययन और सलाहकारी कार्य।
बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग
राज्य वैधानिक आयोग
बिहार अधिनियम 12, 1993, संशोधित
राज्य सूची और सुरक्षा-उपायों पर अधिनियम के अनुसार सलाह।
20. अलग-अलग शक्तियाँ एक-दूसरे के बदले नहीं चलतीं
शक्ति
अर्थ
संस्थागत उदाहरण
भर्ती
लोक सेवा चयन प्रक्रिया चलाना या नियुक्ति पर सलाह देना।
अनुच्छेद 320 और भर्ती नियमों के अंतर्गत बीपीएससी।
वित्तीय अनुशंसा
कर-वितरण, अनुदान और वित्तीय सुदृढ़ीकरण के सिद्धांत सुझाना।
राज्य वित्त आयोग; क्रियान्वयन के लिए फिर भी राज्य की कार्रवाई चाहिए।
विधिक सलाह
कानूनी सलाह देना और सौंपे गए रूप में राज्य के हितों का प्रतिनिधित्व।
महाधिवक्ता।
जाँच / अन्वेषण
मूल अधिनियम से मिली शक्तियों के अनुसार तथ्यों की परीक्षा।
अलग-अलग अधिकार-क्षेत्र में लोकायुक्त या मानवाधिकार आयोग।
अपील / शिकायत सुनना
पारदर्शिता संबंधी वैधानिक विवाद पर निर्णय।
सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना आयोग।
न्यायालय के रूप में निर्णय
न्यायिक अधिकार-क्षेत्र में बाध्यकारी न्यायिक निर्णय देना।
नियमित न्यायालय—जाँच शक्ति वाला हर आयोग अपने-आप न्यायालय नहीं होता।
25. बीपीएससी-शैली अभ्यास: ठीक 20 बहुविकल्पीय प्रश्न