ऐतिहासिक स्रोत, प्रागैतिहासिक काल और पाषाण युग: BPSC प्रारंभिक परीक्षा नोट्स
BPSC प्रारंभिक परीक्षा में क्या पढ़ें
BPSC में इस भाग से सीधे तथ्य और मिलान-आधारित प्रश्न आते हैं: स्रोत–अध्ययन-शाखा, युग–उपकरण, स्थल–राज्य और बिहार का स्थल–काल। अभिलेखशास्त्र, मुद्राशास्त्र, प्रागैतिहासिक काल/आद्य-ऐतिहासिक काल, पुरापाषाण, मध्यपाषाण, नवपाषाण, चिरांद, पैसरा और भीमबेटका अवश्य याद रखें। अलग-अलग क्षेत्रों में परिवर्तन एक ही समय पर नहीं हुआ था; इसलिए हर क्षेत्र के लिए एक ही निश्चित तिथि न मानें।
एक मिनट में सार
इतिहास केवल पुस्तकों से नहीं, साक्ष्यों से बनाया जाता है। पुरातत्त्ववेत्ता औज़ार, मिट्टी के बर्तन, अस्थियाँ, भवन, मुहरें और समाधियों जैसे भौतिक अवशेषों का अध्ययन करते हैं। इतिहासकार अभिलेख, मुद्राएँ, पांडुलिपियाँ और विदेशी यात्रियों के विवरण भी देखते हैं। मानव के आरंभिक अतीत के लिए भौतिक साक्ष्य सबसे महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि उस समय के पठनीय लिखित अभिलेख नहीं मिलते। पाषाण युग का व्यापक क्रम है: पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण। ताम्रपाषाण में ताँबा और पत्थर साथ-साथ प्रयुक्त हुए; इसे केवल पाषाण युग का दूसरा नाम न समझें।
ऐतिहासिक स्रोत एक नज़र में
| स्रोत | इससे क्या पता चलता है | अध्ययन-शाखा / परीक्षा संकेत |
|---|---|---|
| पुरातात्त्विक अवशेष | औज़ार, बर्तन, घर, समाधियाँ, अस्थियाँ, मनके, मुहरें और स्मारक | उत्खनन और सर्वेक्षण; प्रागैतिहासिक काल में बहुत महत्त्वपूर्ण |
| अभिलेख | आदेश, दान, उपाधियाँ, वंशावली और प्रशासन | अभिलेखशास्त्र = अभिलेखों का अध्ययन |
| मुद्राएँ | शासक, चिह्न, अर्थव्यवस्था, व्यापार और कालक्रम | मुद्राशास्त्र = मुद्राओं का अध्ययन |
| पांडुलिपियाँ और साहित्यिक ग्रंथ | विचार, परंपराएँ, सामाजिक व्यवहार और घटनाएँ | स्रोत की आलोचनात्मक जाँच आवश्यक; ग्रंथ बाद में भी नकल हुआ हो सकता है |
| विदेशी विवरण | बाहरी पर्यवेक्षकों द्वारा भारत का वर्णन | इन्हें भारतीय और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ें |
पाषाण युग का क्रम: यही याद रखें
काल–उपकरण–जीवन की तुलना
| काल | मुख्य पहचान | परीक्षा में सामान्य संबंध | किससे न मिलाएँ |
|---|---|---|---|
| पुरापाषाण | हस्तकुठार, विदारणी, शल्क और अन्य पाषाण उपकरण | आरंभिक शिकारी-संग्राहक | नियमित खेती और चमकाए उपकरण |
| मध्यपाषाण | लघु-पाषाण उपकरण / माइक्रोलिथ | शिकार, मछली पकड़ना, संग्रह और क्षेत्रीय शैलचित्र | मध्यकालीन इतिहास का “मध्य युग” |
| नवपाषाण | घिसे-चमकाए पाषाण उपकरण, कुल्हाड़ी | खाद्य उत्पादन और कई क्षेत्रों में स्थायी ग्राम | हड़प्पा की नगरीय सभ्यता |
| ताम्रपाषाण | ताँबा + पत्थर | दोनों पदार्थों का उपयोग करने वाली ग्राम संस्कृतियाँ | केवल पाषाण-उपकरण वाला काल |
यहाँ पुरातत्त्व सबसे अधिक क्यों जरूरी है
प्रागैतिहासिक समुदायों ने हमारे लिए पठनीय ग्रंथ नहीं छोड़े। उनके जीवन का अनुमान उस संदर्भ से लगाया जाता है जिसमें वस्तुएँ मिलती हैं: उपकरण की सामग्री और घिसावट, पशु-अस्थियाँ, आग जलाने के स्थान, फर्श, शैलचित्र, समाधियाँ और मिट्टी की परतें। अकेली वस्तु से कम जानकारी मिलती है; उसका उत्खनन-संदर्भ अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। रेडियोकार्बन तिथि-निर्धारण उपयुक्त जैविक अवशेषों के लिए उपयोगी है, हर पाषाण उपकरण के लिए नहीं।
बिहार विशेष दृष्टि
| स्थल / क्षेत्र | जिला / राज्य संबंध | BPSC के लिए महत्त्व |
|---|---|---|
| चिरांद | सारण, बिहार | महत्त्वपूर्ण नवपाषाण स्थल; बिहार पुरातत्त्व निदेशालय इसे उत्खनित नवपाषाण स्थलों में गिनता है। |
| तराडीह | बिहार | बिहार पुरातत्त्व निदेशालय द्वारा नवपाषाण स्थलों में उल्लिखित। |
| पैसरा | मुंगेर, बिहार | निदेशालय के अनुसार मध्यपाषाण आवासीय अवशेष मिले हैं। |
| कैमूर, नवादा और जमुई की पहाड़ियाँ | बिहार | निदेशालय ने इन क्षेत्रों में प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का उल्लेख किया है। |