BPSC के पाठ्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और उसमें बिहार की भूमिका शामिल है। चंपारण को पाँच सूत्रों से याद करें: 1917, नील, तीन-कठिया, राजकुमार शुक्ल और गांधी। जाँच समिति, दमनकारी प्रथा की समाप्ति, 1918 का अधिनियम और बिहार के स्थान भी पढ़ें।
कालक्रम
चंपारण में समस्या क्यों बनी?
यूरोपीय नील-रोपणकर्ता कई रैयतों को तीन-कठिया व्यवस्था के अंतर्गत नील उगाने के लिए बाध्य करते थे। परीक्षा में प्रचलित मानक तथ्य है कि किसान को अपनी भूमि के बीस भागों में से तीन भाग पर नील उगानी पड़ती थी। इसलिए मुद्दा जबरन खेती, रोपणकर्ताओं की माँगों और रैयतों की कठिनाई से जुड़ा था। नील-किसान राजकुमार शुक्ल ने यही शिकायत गांधी तक पहुँचाई।
व्यक्ति और उनकी भूमिका
व्यक्ति / समूह
याद रखने योग्य भूमिका
महात्मा गांधी
किसानों की शिकायतों की जाँच की; अहिंसक प्रतिरोध अपनाया; जाँच समिति के सदस्य बने।
राजकुमार शुक्ल
चंपारण के नील-किसान जिन्होंने गांधी को जिले में आने के लिए प्रेरित किया।
नील-किसान / रैयत
जबरन नील-खेती और उससे जुड़ी वसूली झेलने वाले लोग।
बिहार के स्वयंसेवक और वकील
शिकायतें दर्ज कराने में सहयोग किया; सरकारी विवरण में राजेंद्र प्रसाद, धरणीधर प्रसाद, गोरख प्रसाद, रामनवमी प्रसाद, शंभू शरण और अनुग्रह नारायण सिंह के नाम आते हैं।
यूरोपीय रोपणकर्ता
जिनकी बागान-व्यवस्था से जुड़ी दमनकारी नील-खेती को आंदोलन ने चुनौती दी।
वे शब्द जिनमें भ्रम होता है
शब्द
सही संबंध
सामान्य जाल
तीन-कठिया
भूमि के 3/20 भाग पर अनिवार्य नील-खेती।
इसे कपड़ा-मिल या नमक कर से न जोड़ें।
चंपारण
1917, बिहार, नील-किसान, गांधी।
इसे खेड़ा (गुजरात) या अहमदाबाद (मिल-मजदूर) से न बदलें।
राजकुमार शुक्ल
नील-किसान जिन्होंने गांधी को आने के लिए प्रेरित किया।
इन्हें बिहार का गवर्नर न मानें।
चंपारण कृषि अधिनियम
1918; जाँच और तीन-कठिया की समाप्ति के बाद।
इसे 1917 की जाँच से पहले का न मानें।
प्रारंभिक परीक्षा के जाल
3/20 तीन-कठिया का मुख्य संख्यात्मक संकेत है।
चंपारण बिहार में है; खेड़ा गुजरात में है।
राजकुमार शुक्ल नील-किसान थे, बिहार के गवर्नर नहीं।
जाँच समिति 1917 में बनी; चंपारण कृषि अधिनियम 1918 से जुड़ा है।
आंदोलन का प्रमुख कृषि-विषय जबरन नील की खेती था।
किसी प्रश्न को “आधिकारिक PYQ” तभी कहें जब वह आधिकारिक प्रश्न-पुस्तिका से सत्यापित हो।